सदगुरू जैसा परम् हितैशी कोई नहीं संसार में
गुरू चरणों में पूर्ण समर्पण कर हो जा भवपार रे
सदगुरू जैसा परम् हितैषी....
लख चौरासी भटक भटक कर यह मानव तन पाया हैं
काम क्रोध मद मोह में पड़कर इसको व्यर्थ गँवाया हैं
कर सत्संग नाम हरि का जप नाम हरि का जप
कर अपना उद्धार रे
सदगुरू जैसा परम् हितैषी....
मानव जनम प्रीति हरि गुरू में बड़े भाग्य से मिलते हैं
पा सदगुरू की कृपा ह्रदय में फूल धर्म के खिलते हैं
धर्म व्रती बन कर्म सर्व हित कर सबका उपकार रे
सदगुरू जैसा परम् हितैषी....
सदगुरू की तू बात मानकर हरि चरणों में प्रीति जगा
नारायण नारायण कहकर भवभय सारे दूर भगा
राग द्वेष मद अहंकार तज कर ले सबसे प्यार रे
सदगुरू जैसा परम् हितैषी....
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