उंगली पकड़ कर चलना सिखाया,साथ मेरे वो रहते थे
आगे बढ़ो तुम आगे बढ़ो,पिता सदा ये कहते थे
मेरे ही खातिर माँ का हर एक घूँट निवाला था
कितने कष्टों को सहकर उसने ही मुझको पाला था
कैसे उसे खिलाऊँ और कैसे खाऊँ मैं
मात पिता के उपकारों का कर्ज कैसे चुकाऊँ मैं
मातृ देवो भव पितृ देवो भव
माँ की कदर ना जानी ठुकराया प्यार पिता का
झूठे प्यार के मोहमाया में दिल दुखाया अपनों का
माँगू कैसे क्षमा मैं कैसे प्यार को पाऊँ मैं
मात पिता के उपकारों का कर्ज कैसे चुकाऊँ मैं
मातृ देवो भव पितृ देवो भव
संस्कृति अपनी ही भुलाकर दुश्मन बन गया मैं अपना
मात पिता को दुःख पहुँचाकर प्यार का देखा था सपना
बापूजी ने मुझ अनजान को राह सत्य की दिखलाई
मात पिता की सेवा करना बात यहीं बस सिखलाई
गुरुचरणों में रहकर सारा जनम लगाऊँ मैं
मात पिता पूजन परम कर्तव्य मानू मैं
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