Sant Shri Asharamji Bapu

Sant Shri Asharamji Bapu is a Self-Realized Saint from India, who preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being.

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संत श्री आशारामजी बापू

भारत के संत श्री आशारामजी बापू आत्मज्ञानी संत हैं, जो मानवमात्र मे एक सच्चिदानंद इश्वर के अस्तित्व का उपदेश देते है

मात पिता पूजन परम कर्तव्य

 उंगली पकड़ कर चलना सिखाया,साथ मेरे वो रहते थे

आगे बढ़ो तुम आगे बढ़ो,पिता सदा ये कहते थे

मेरे ही खातिर माँ का हर एक घूँट निवाला था

कितने कष्टों को सहकर उसने ही मुझको पाला था

कैसे उसे खिलाऊँ और कैसे खाऊँ मैं 

मात पिता के उपकारों का कर्ज कैसे चुकाऊँ मैं

मातृ देवो भव पितृ देवो भव


माँ की कदर ना जानी ठुकराया प्यार पिता का

झूठे प्यार के मोहमाया में दिल दुखाया अपनों का

माँगू कैसे क्षमा मैं कैसे प्यार को पाऊँ मैं

मात पिता के उपकारों का कर्ज कैसे चुकाऊँ मैं

मातृ देवो भव पितृ देवो भव


संस्कृति अपनी ही भुलाकर दुश्मन बन गया मैं अपना

मात पिता को दुःख पहुँचाकर प्यार का देखा था सपना

बापूजी ने मुझ अनजान को राह सत्य की दिखलाई

मात पिता की सेवा करना बात यहीं बस सिखलाई 

गुरुचरणों में रहकर सारा जनम लगाऊँ मैं

मात पिता पूजन परम कर्तव्य मानू मैं

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मातृ पितृ पूजन के पौधे

 मातृ पितृ पूजन के पौधे गुरूवर ने जो सींचे

इस महा वृक्ष की छाया पा रहे विश्व के बच्चे


एक नहीं सौ सौ मुख से गा न सकें इसकी महिमा

मात पिता के रूप में मिला हमें परमात्मा

ना दिल क्यों इनका दुखा ये तो हैं कितने अच्छे

इस महा वृक्ष की छाया पा रहे विश्व के बच्चे


नौ महीने हर दुःख सहकर लाए धरती पर तुझको

भूल उनकी ममता को प्रेम दिवस कहता किसको

मात पिता संग दिन मना ये तो हैं कितने अच्छे

इस महा वृक्ष की छाया पा रहे विश्व के बच्चे


बापू का यह दिव्य प्रसाद मिटा रहा जन जन विषाद

देश विदेश में मातृ पितृ का गूँज उठा हैं शंखनाद

मात पिता संग दिन मना ये तो हैं कितने अच्छे

इस महा वृक्ष की छाया पा रहे विश्व के बच्चे


पाकर के तुमको गुरूवर हमने सब खुशियाँ पाई

मातृ पितृ के इस दिवस पर हमें याद तेरी आई

हम बालक बापू तेरे तुम मात पिता मेरे सच्चे

इस महा वृक्ष की छाया पा रहे विश्व के बच्चे

मातृ पितृ पूजन के पौधे गुरूवर ने जो सींचे

इस महा वृक्ष की छाया पा रहे विश्व के बच्चे

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मातृ पितृ पूजन की राह दिखाने वाले

 मातृ पितृ पूजन की राह दिखाने वाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले

कलियुग में सतयुग को मोड़ के लानेवाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले

मातृ पितृ पूजन की राह दिखाने वाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले


हीरों पे माटी की परतें जमी हुई थी

देखना क्या था और कहाँ नजरें थमी हुई थी

दो कौड़ी भी ना था कलतक दाम हमारा

तूने छुआ तो मोल बढ़ा हर शाम हमारा

ज्ञान अमृत से धोके हमें चमकाने वाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले

कलियुग में सतयुग को मोड़ के लानेवाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले


धर्म क्या हैं संतान का तुमने हमें बताया

सुबह का भूला शाम को अपने घर लौट आया

मन में पल रहा था जो रावण उसे जलाया

धन्यवाद गुरुदेव राम को राम बनाया

मुरझाए फूलों को फिर महकाने वाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले

कलियुग में सतयुग को मोड़ के लानेवाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले

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मात-पिता-गुरू पूजन करिए

 मात-पिता-गुरू पूजन करिए, मात-पिता भगवान हैं

उनकी सेवा निशदिन करता,वो इंसान महान हैं (2)

मात-पिता-गुरू को वंदन (3)


वीर शिवाजी ने मातृ भक्ति का अनुपम ये परिचय दिया

दुश्मन की वधुओं को माता कहकर घर पे विदा किया

मात-पिता-गुरू, मात-पिता-गुरू सेवा करके 

आत्मज्ञान को पा लिया

उनकी सेवा निशदिन करता,वो इंसान महान हैं 

मात-पिता-गुरू पूजन करिए, मात-पिता भगवान हैं

उनकी सेवा निशदिन करता,वो इंसान महान हैं   

मात-पिता-गुरू को वंदन (3)


पितृ भक्ति से भीष्म ने पाया इच्छा मृत्यु का वरदान

स्वर्ग भूमि में अर्जुन की भी मातृ भाव से बढ़ गई शान (2)

पिता इंद्र ने कहा पुत्र तुम सम ना कोई वीर महान

उनकी सेवा निशदिन करता,वो इंसान महान हैं 

मात-पिता-गुरू पूजन करिए, मात-पिता भगवान हैं

उनकी सेवा निशदिन करता,वो इंसान महान हैं   

मात-पिता-गुरू को वंदन (3)

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पूजन कर लो मात पिता का

 पूजन कर लो मात-पिता का

शुभदिन आया हैं

पूजन कर लो मात-पिता का

आज करेंगे मात-पिता का पूजन और वंदन

मात-पिता-गुरू के चरणों में अर्पण ये जीवन

जिसने दिया हैं जीवन हमको

उनको हमारा नमन, अर्पण ये जीवन


ममता की मूरत हैं माँ, पिता रूप में हैं महादेवा 

दोनों रूप में है गुरुदेवा, करूणा सागर गुरुदेवा


मात-पिता-गुरू सच्चे तीरथ, पुण्यों का करूँ अर्जन

उनकी कृपा से विघ्न कटे सब, करते हैं वो रक्षण

बड़े उपकार उनके, चुका ना हम हैं सकते

प्रेम की वर्षा करते, सदा शुभमंगल करते

वो तो हैं धूप सहते हमें छाँव में रखते


आज करेंगे मात-पिता का पूजन और वंदन

ममता की मूरत हैं माँ, पिता रूप में हैं महादेवा 

दोनों रूप में है गुरुदेवा, करूणा सागर गुरुदेवा


स्वर्ण सुशोभित आसन पर मैं मात-पिता को बिठाऊँ

परम् सुगन्धित केसर चंदन से उनको तिलक लगाऊँ

करूँ मैं उनका अर्चन, सभी देवों का दर्शन

उनकी पूजा करने से सभी का हो मन पावन

उनकी मुस्कान से ही सभी का होता मंगल


आज करेंगे मात-पिता का पूजन और वंदन

ममता की मूरत हैं माँ, पिता रूप में हैं महादेवा 

दोनों रूप में है गुरुदेवा, करूणा सागर गुरुदेवा

पूजन कर लो मात-पिता का शुभदिन आया हैं

शुभदिन आया हैं

मात-पिता-गुरू सेवा से ही जनम सुहाया हैं

जनम सुहाया हैं

पूजन कर लो मात-पिता का


गुरूवर की महिमा हैं भारी जाने दुनिया सारी

लाखों जनम से भटके हैं हम, गुरू ने बिगड़ी सँवारी

गुरू ही ब्रह्मा विष्णु, गुरू तो हैं शिवशंकर

उनकी कृपा दृष्टि से मिटे सब रोग भयंकर

उनकी मीठी निगाहें स्नेह बरसाए हर पल


आज करेंगे मात-पिता का पूजन और वंदन

मात-पिता-गुरू के चरणों में अर्पण ये जीवन

जिसने दिया हैं जीवन हमको

उनको हमारा नमन, अर्पण ये जीवन

ममता की मूरत हैं माँ, पिता रूप में हैं महादेवा 

दोनों रूप में है गुरुदेवा, करूणा सागर गुरुदेवा

पूजन कर लो मात-पिता का शुभदिन आया हैं

शुभदिन आया हैं

मात-पिता-गुरू सेवा से ही जनम सुहाया हैं

जनम सुहाया हैं

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गुरू का द्वार ना छूटे

गहरा हैं भवसागर और तुम ही तारणहारे

तूफानों में कश्ती गुरुदेव ही खेवनहारे

तेरे हाथों सौंप दी हमने जीवन की पतवार

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे...


झट से दौड़े आते कोई दिल से तुम्हें पुकारे

देह कहीं भी रहती तुम रहते पास हमारे

तेरे चरणों में ही बसा हैं भक्तों का संसार

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे...


भावों के पुष्पों को गुरूवर हैं सदा स्वीकारें

हम तो बिखरे जग में गुरूवर ही हमें निखारे

सबके मन की जानने वाले ये ही जाननहार

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे...


करना कृपा हे गुरूवर हम कभी तुम्हें न बिसारे

मन मंदिर में बिठाकर हम आरती नित्य उतारे

तुम बिन मेरे दाता अब तो लगे हैं सब बेकार

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे...


कितना सुंदर कितना प्यारा हैं गुरू का दरबार

हम करते हैं इस द्वारे को वंदन बारंबार


अंत में दुःख देते हैं रिश्ते दिखते जो सारे

इस नश्वर माया से गुरूवर ही हमें निवारे

गुरू शरण में आ जाए तो पड़े न यम की मार

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे... 


फिकर नहीं हैं हमको हम तो हैं तेरे सहारे

तेरा तुझको अर्पित तू आप ही हमें सँवारे

तुम ही मंजिल साहिल तुम ही हो सबका आधार

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे...

 

किन शब्दों में बताऊँ एहसान प्रभु मैं तुम्हारे

करना कृपा हे गुरूवर हम तुम्हें कभी न बिसारे

तेरे ज्ञान से भागते गुरूवर सारे रोग विकार 

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे... 


कितना सुंदर कितना प्यारा हैं गुरू का दरबार

हम करते हैं इस द्वारे को वंदन बारंबार

कभी विश्वास न टूटे गुरू का द्वार ना छूटे... 

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गुरूदेव से निराला कोई और नहीं रे

 गुरूदेव से निराला कोई और नहीं रे

बेड़ा पार लगानेवाला कोई और नहीं रे 


माया के वो बंधन तोड़े प्रभु चरणों से प्रीति जोड़े 

सारे दुःख हटानेवाला कोई और नहीं रे 

गुरूदेव से निराला कोई और नहीं रे


उपनिषद की कथा सुनावे, मेरे दिल की व्यथा मिटावे

जनम मरण को मिटाने वाला कोई और नहीं रे 

गुरूदेव से निराला कोई और नहीं रे


जीवन दर्शन हमें करावे ,सद्चित आनंद रूप बतावें 

मुक्तिधाम दिलाने वाला कोई और नहीं रे 

गुरूदेव से निराला कोई और नहीं रे


ऐसे सदगुरू के गुण गाओ, चरणों में तुम शीश नवाओ 

भव के बंध छुडानेवाला कोई और नहीं रे

गुरूदेव से निराला कोई और नहीं रे 

बेड़ा पार लगानेवाला कोई और नहीं रे

गुरूदेव से निराला कोई और नहीं रे 

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सदगुरू जैसा परम् हितैषी

 सदगुरू जैसा परम् हितैशी कोई नहीं संसार में

गुरू चरणों में पूर्ण समर्पण कर हो जा भवपार रे

सदगुरू जैसा परम् हितैषी....


लख चौरासी भटक भटक कर यह मानव तन पाया हैं

काम क्रोध मद मोह में पड़कर इसको व्यर्थ गँवाया हैं

कर सत्संग नाम हरि का जप नाम हरि का जप 

कर अपना उद्धार रे 

सदगुरू जैसा परम् हितैषी....


मानव जनम प्रीति हरि गुरू में बड़े भाग्य से मिलते हैं

पा सदगुरू की कृपा ह्रदय में फूल धर्म के खिलते हैं

धर्म व्रती बन कर्म सर्व हित कर सबका उपकार रे 

सदगुरू जैसा परम् हितैषी....


सदगुरू की तू बात मानकर हरि चरणों में प्रीति जगा

नारायण नारायण कहकर भवभय सारे दूर भगा

राग द्वेष मद अहंकार तज कर ले सबसे प्यार रे

सदगुरू जैसा परम् हितैषी....

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