Sant Shri Asharamji Bapu

Sant Shri Asharamji Bapu is a Self-Realized Saint from India, who preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being.

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संत श्री आशारामजी बापू

भारत के संत श्री आशारामजी बापू आत्मज्ञानी संत हैं, जो मानवमात्र मे एक सच्चिदानंद इश्वर के अस्तित्व का उपदेश देते है

गुरू चरणों में हैं प्रार्थना

 वंदना वंदना गुरू चरणों में मेरी वंदना

आराधना आराधना करते रहे तेरी आराधना

नमः शिवाय नमः शिवाय हर हर भोले नमः शिवाय

वंदना वंदना गुरू चरणों में मेरी वंदना


सब ओर से मुख मोड़ कर, जग के सहारे सब छोड़कर

प्रार्थना प्रार्थना गुरू चरणों में मेरी ये प्रार्थना

नमः शिवाय नमः शिवाय हर हर भोले नमः शिवाय


निर्भय बनें निर्मल बनें,सुख दुःख का करें सामना

याचना याचना गुरू दर पे हैं मेरी याचना

वंदना वंदना गुरू चरणों में मेरी वंदना

नमः शिवाय नमः शिवाय हर हर भोले नमः शिवाय


संतोष की मुझे दौलत मिले, दुनिया से ना कामना

गुरू दर्शन मिले, गुरू वाणी मिले,भक्तों की हैं प्रार्थना

वंदना वंदना गुरू चरणों में मेरी वंदना

याचना याचना गुरू चरणों में हैं ये मेरी याचना

प्रार्थना प्रार्थना गुरू दर पे हैं ये मेरी प्रार्थना

नमः शिवाय नमः शिवाय हर हर भोले नमः शिवाय

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गुरूदेव मेरा जीवन

 गुरुदेव मेरा जीवन तेरे प्यार के लिए हो

जिंदगी हो लेकिन उपकार के लिए हो...


उपकार के लिए हो, तेरे प्यार के लिए हो

उपकार के लिए हो, तेरे ज्ञान के लिए हो

उपकार के लिए हो, तेरे नाम के लिए हो

गुरुदेव मेरा जीवन ...


हरि नाम की लगन हो,भक्ति में मन मगन हो

भक्ति में मन मगन हो

चाहे हमारी नैय्या संसार में फँसी हो

गुरुदेव मेरा जीवन ...


मेरे मन मंदिर में गुरुवर तुम ज्ञान की ज्योत जगा दो

मेरे प्राण भी न्यौछावर गुरुद्वार के लिए हो

भगवान मेरा जीवन ...


तेरा नाम हर पल गाऊँ , तेरी भक्ति में खो जाऊँ

वाणी हो जो मेरी गुणगान के लिए हो

गुरुदेव मेरा जीवन ...

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मैं बालक तेरा प्रभु

मैं बालक तेरा प्रभु जानू योग न ध्यान

गुरुकृपा मिलती रहे दे दो ये वरदान

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध

तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध

संत मिलन को जाइये, तज माया अभिमान

ज्यों ज्यों पग आगे धरे कोटि यज्ञ समान

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे...


कबीरा कुआ एक है, पनिहारी अनेक

न्यारे न्यारे बर्तनों में, पानी एक का एक

साहिब तेरी साहिबी, घट घट रही समाय

जैसे मेहंदी बीच में, लाली रही छुपाय

रहिमन धागा प्रेम का, मत खींचो टूट जाय

टूटन से जोड़े नहीं जुड़े गाँठ पड़ जाय

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे...

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सबकुछ पा लिया गुरू के द्वार से

सबकुछ पा लिया गुरू के द्वार से

सर को झुका लिया गुरू के द्वार पे...


बीच भँवर में मेरी नैय्या न छोड़ना

तन से हो जितनी दूरी , मन से न करना

जिंदगानी हो दाता तेरे ही नाम की

सबकुछ पा लिया...


भक्ति का दान देना , श्रद्धा अपार देना

ये दुनिया भूल भुलैय्या,  मुझको उबार लेना

कि फँस न जाए हम इस मझधार में

सबकुछ पा लिया...


दर तेरा पाया जिसने भाग्य बनाया

उजड़े चमन को तूने फिरसे खिलाया

कि अँखियाँ तरस गई तेरे इंतजार में

तेरे इंतजार में...

ये अँखियाँ तरस गई तेरे इंतजार में...

Aidio


अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे

 अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे

तो कैसे लगेंगे भव से किनारे

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे


हमारे लिए क्यों देर किए हो

गणिका अजामिल को पल में मिले हो

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे...


संत न होते तो जग दुःख में जलता

पग पग विकारों में मन ये फिसलता

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे...


अगर ना होते संत प्यारे

ना धरती होती ना चाँद सितारे

अगर नाथ देखोगे अवगुण हमारे...

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गुरू मेरे पार लगैय्या

 गुरू का नाम हैं आधारा, देता सबको यही सहारा

गुरू मेरे ओ मेरे पार लगैय्या


गुरू की दृष्टि से कलियाँ मन की खिलती

सुख का सूरज उगता, दुःख की दिशा हैं ढलती

वो तो सबकी पार करे हैं नैय्या

गुरू सबकी पार करे हैं नैय्या..नैय्या

गुरू मेरे पार लगैय्या...


गुरू की करूणा से व्याधियाँ सारी कटती

गुरू के द्वारे पे दौलत नाम की लुटती

लगता हैं संग इन्हीं का प्यारा

हमें तो लगता हैं संग इन्हीं का प्यारा..प्यारा

गुरू मेरे पार लगैय्या...


गुरू की रहमत से भ्रांतियाँ सारी मिटती

बेड़ी जन्मों की गुरू द्वारे पे कटती

वो तो सबकी पार करे हैं नैय्या

गुरू सबकी पार करे हैं नैय्या..नैय्या

गुरू मेरे पार लगैय्या...

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पाके ये सुंदर तन

 पाके सुंदर ये तन कर प्रभु का भजन

पाके सुंदर ये तन कर हरि का भजन

जिंदगानी का कोई भरोसा नहीं

जो आए यहाँ फिर वो जाए कहाँ

दुनियाफानी का कोई भरोसा नहीं

पाके सुंदर ये तन कर प्रभु का भजन

जिंदगानी का कोई भरोसा नहीं

ॐ नमः शिवाय,ॐ नमः शिवाय...


खाली हाथों यहाँ से सिकंदर गया

दोनों हाथ खुले थे वो कहकर गया

जो यहीं से लिया वो यहीं पर दिया

लाभ हानी का कोई भरोसा नहीं

पाके सुंदर ये तन...


अरबों वाले गए ,खरबों वाले गए

ओ कितने राजा गए , महाराजा गए

श्रेष्ठ जीवन बना , कर सभी का भला

माटी के तन का कोई भरोसा नहीं

पाके सुंदर ये तन...


बालपन खेल-कूदों में ही खो दिया

जब आई जवानी भोगों में खो दिया

जब आई जवानी भोगों में रस लिया 

क्षणभंगुर ये तन करे इसमें जतन

इन श्वासों का कोई भरोसा नहीं

पाके सुंदर ये तन कर प्रभु का भजन

जिंदगानी का कोई भरोसा नहीं

जो आता यहाँ फिर वो जाता कहाँ

दुनियाफानी का कोई भरोसा नहीं

ॐ नमः शिवाय,ॐ नमः शिवाय...

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दुनिया के इस मेले में

 दुनिया के इस मेले में आना हैं और जाना हैं

मेरा तेरा कुछ भी नहीं हरि नाम साथ में जाना हैं।।


दुनिया एक तमाशा हैं यहाँ पूरी न होती आशा हैं

जोड़-जोड़  सब चले गए मिलती यहाँ निराशा हैं

माल खजाना कुछ भी नहीं गुरू नाम साथ में जाना हैं

गुरू मंत्र साथ में जाना हैं,गुरू ज्ञान साथ में जाना हैं

दुनिया के इस मेले में...


सूरज जो उदय हुआ साँझ को वो ढल जाता हैं

खिला जो फूल बगिया में एक दिन वो मुरझाता हैं

बसंत बहार कुछ भी नहीं आना हैं सो जाना हैं

दुनिया के इस मेले में...


खिला-पिला के देह बढ़ाई वो भी अग्नि जलाना हैं 

कर सत्संग अभी से प्यारे नहीं तो फिर पछताना हैं

पड़ा रहेगा माल खजाना ,छोड़ त्रिया-सुत जाना हैं

दुनिया के इस मेले में आना हैं और जाना हैं

सोना चाँदी कुछ भी नहीं हरि नाम साथ में जाना हैं

मेरा तेरा कुछ भी नहीं गुरू ज्ञान साथ में जाना हैं

गुरू मंत्र साथ में जाना हैं,गुरू ज्ञान साथ में जाना हैं

प्रभु नाम साथ में जाना हैं, तेरा कर्म साथ में जाना हैं

माल खजाना कुछ भी नहीं गुरू नाम साथ में जाना हैं

हरि ॐ, ह्री ॐ.....

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हिंदुत्व की शान हैं बापू

 संस्कृति का मान बचाने जिसने जगाई हर दिल में आग

जिसका जीवन जग को सिखाता क्या हैं धर्म क्या हैं त्याग

धर्म ध्वजा फहराई जगत में जिसने विवेकानंदजी के बाद

 खुद को संस्कृति पे वारा हिंदुत्व की दिलाई हैं याद

ये गाथा हैं उस योगी की जिसका सबकुछ जगहित अर्पण

जो जग को सत मार्ग दिखाता जिसकी वाणी वेदांत का दर्पण


राष्ट्र का सम्मान हैं बापू संस्कृति के प्राण हैं बापू

हम सबका अभिमान हैं बापू मातृभूमि की शान हैं बापू

जान हैं बापू मान हैं बापू शान हैं बापू आन हैं बापू


दशकों से दिन रैन तपे खुद मातृभूमि को बचाते रहे

हर मानव के भीतर झाँका सोये हिंदू को जगाते रहे

बापू का संकल्प हैं भारत विश्वगुरु के पद पे आएगा

शांति प्रेम सौहार्द्र सहिष्णुता ये गीत सारा जग गायेगा

इनकी नाई अडिग सदा जो संस्कृति का हर युध्द लड़े

उनके सब उपकार भुला के धर्म द्रोही विरुद्ध ख़ड़े

राष्ट्र का सम्मान हैं बापू....


खत्म करो अब दौर अन्याय का सत्य खुद भी चीख खड़ा

क्यों आँखों पर पट्टी बाँधे बुद्धि पर क्यों पर्दा पड़ा?

जो जीते हैं सबकी खातिर क्यों उनकी परवाह ही नहीं

झूठे आरोपों में फँसाया क्या सत्कर्मों का सिला यही?

मानव तो हैं धरती पर लेकिन मानवता धूल मिली 

क्यों वयोवृद्ध संत जेल में ,क्यों न्याय की नींव हिली?

राष्ट्र का सम्मान हैं बापू...


इतिहास का काला युग हैं जहाँ अन्याय ने गगन छुआ

पीड़ा से कहरा रहे दिल फिरभी ना कोई न्याय हुआ

बापू पे अत्याचार हुआ हर दिल से ये चित्कार उठी

खून के आँसू रोती हैं धरती प्रकृति की पुकार उठी

युगों युगों तक याद रहेगा दौर ये अत्याचार का

बापू का तो डंका ही बजेगा,भेद खुलेगा कुप्रचार का

राष्ट्र का सम्मान हैं बापू...

आया शरण ठोकरें जग की खा के

 आया शरण ठोकरें जग की खा के

हटूँगा प्रभू तेरी दया दृष्टि पाके

आया शरण ठोकरें जग की खा के...


पहले मगन हो सुखी नींद सोया

सबकुछ पाने का सपना संजोया

मिला तो वही जो लाया लिखा के

आया शरण...


मान ये काया का हैं बस छलावा

रावण सा मानी भी बचने न पाया

रखूँगा कहाँ तक मैं खुद को बचा के

आया शरण...


कर्मों की लीला बड़ी है निराली

हरिश्चंद्र मरघट की करे रखवाली

समझ में ये आया सबकुछ लुटाके

आया शरण...


न हैं चाह कोई न हैं कोई इच्छा

अपनी दया की मुझे दे दो भिक्षा

जिसे सबने छोड़ा उसे तू ही राखे


आया शरण ठोकरें जग की खा के

हटूँगा प्रभू तेरी दया दृष्टि पाके

आया शरण ठोकरें जग की खा के...

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साधकों ने हैं बाँधी प्रेम की डोरी

 साधकों ने हैं बाँधी प्रेम की डोरी

 सदगुरू आएँगे

हम सबकी लगी हैं प्रीत की डोरी

 सदगुरू आएँगे

अपना बनाते दर पे बुलाते

गिरते हुओं को उठाते हैं

मेरे सदगुरू हैं इतने महान 

जो रखते हैं सबका ध्यान


गहरा पावन दुर्लभ सत्संग 

सबको सहज में सुनाते हैं गुरूवर

नाम की दौलत मोक्ष की कुँजी

हम सबको दे देते हैं गुरूवर

सबसे निराले सबको संभाले

हम सबके रखवाले हैं

मेरे सदगुरू हैं इतने महान 

जो रखते हैं सबका ध्यान


धन दौलत और मान बढाई

इनका मोह छुडाते हैं गुरूवर

भीतर का सुख आनंद शांति

अंतर घट में दिलाते हैं गुरुवर

तन भी हैं तेरा मन भी हैं तेरा

तुम ही केवल हमारे हो

मेरे सदगुरू हैं इतने महान 

जो रखते हैं सबका ध्यान


द्वार पे इनके जो भी आता

खाली नहीं लौटाते हैं गुरूवर

झोली भरते दुःख भी  हरते 

दाता सभीके कहाते हैं गुरूवर

विघ्न विनाशी सब ऊर वासी

तुम ही जग से न्यारे हो

मेरे सदगुरू हैं इतने महान 

जो रखते हैं सबका ध्यान

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माझी गुरू माऊली

विट्ठल विट्ठल विट्ठला विट्ठल विट्ठल विट्ठला...

मी हिंडलो ज्याच्यासाठी ते आले मझ्यासाठी

सोबत माझ्या अशी राहते जशी हो सावली

गुरु माऊली माझी गुरु माऊली....

विट्ठल विट्ठल विट्ठला विट्ठल विट्ठल विट्ठला...


तुम्ही नेहमी सोबत माझ्या पण ऐकत नाही मन

अहो राहून राहून करतो तुझी आठवण

रडक्या बाळाची हाक ऐकुनी आई धावली

गुरु माऊली माझी गुरु माऊली....

विट्ठल विट्ठल विट्ठला विट्ठल विट्ठल विट्ठला...


तुझ्या चरणी प्रीती आहे जीवनाचे आधार

राहू तुझ्यापाशी तू आम्हा कर स्वीकार

भक्तांनी तुझ्या या किती वाट पहिली

गुरु माऊली माझी गुरु माऊली....

विट्ठल विट्ठल विट्ठला विट्ठल विट्ठल विट्ठला...


मनाच्या मंदिरात आहे गुरुमूर्ती

सकाळ सन्ध्याकाळ करू त्याची आरती

ठाव नाही मला देव पावला की देवी पावली

गुरु माऊली माझी गुरु माऊली....

विट्ठल विट्ठल विट्ठला विट्ठल विट्ठल विट्ठला...

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जय गुरू स्तुति

 जय गुरू आद्य निरंजन ईश्वर

जय गुरू पारब्रह्म परमेश्वर

जय गुरू अजर अखंड अविनाशी

जय गुरू राम सकल उरवासी (२)


जय गुरू सर्वेश्वर सचराचर

जय गुरूदेव दया करुणाकर

जय गुरूदेव साक्षी स्वतंत्र

जय गुरू व्यापक भीतर बाहर

जय गुरू राम जय गुरू राम ....


जय गुरू तत्वमसि पद तुरिया

जय गुरू ईश एक रस भरिया

जय गुरू शब्दातीत शुद्ध चेतन

जय गुरू पूर्णानंद पुरुषोत्तम

जय गुरू ज्ञान ध्यान विज्ञाना

जय गुरू भक्ति मुक्ति के दाता

जय गुरू जप तप वेद पुराणा

जय गुरू ब्रह्म रूप भगवाना


जय गुरू आद्य निरंजन ईश्वर

जय गुरू पारब्रह्म परमेश्वर

जय गुरूदेव जय गुरूदेव (२)

जय गुरू राम जय गुरू राम (२)


जय गुरू चतुर्दिशा अवतारा

जय गुरू मंत्र अधम उध्दारा

जय गुरू सकल सृष्टि के कर्ता

जय गुरू अष्टयोग के धर्ता

जय गुरू सकल ध्रुम सूर सरिता

जय गुरू पावन परम पुनीता

जय गुरू तीरथ ज्ञान प्रयागा

जय गुरू संयम व्रत वैरागा

जय गुरू आद्य निरंजन ईश्वर

जय गुरू पारब्रह्म परमेश्वर

जय गुरू राम जय गुरू राम (२)


श्रीमुख देव किए गुर जाई

जीवनमुक्त भये निधी पाई

पार्वती गुरू जबहिं चीन्हा

अमर आतम पदही दीन्हा

रामचंद्र पूरण ब्रह्म सोई

गुरू वशिष्ठ को इष्ट कराई

कृष्ण नाम सहजे अघ हरना

सो सेवे सद्गुरु के चरणा

जय गुरू राम जय गुरू राम ....


वेद बखाने गुरू की महिमा

पार न पावे हरिहर ब्रह्मा

श्रीगुरू सुजस करूँ निततारा

होये रसना जो अनंत अपारा

जैसे रवि बिन रात न जाई

गुरू बिन सुतन तरणहरी नाही 

सतगुरुचरण प्रीत नही लागी

सो प्राणी अति मंद भागी 

जय गुरू राम जय गुरू राम ....


जय गुरू आद्य निरंजन ईश्वर

जय गुरू पारब्रह्म परमेश्वर

जय गुरू अजर अखंड अविनाशी

जय गुरू राम सकल उरवासी (२)


जय गुरू सर्वेश्वर सचराचर

जय गुरूदेव दया करुणाकर

जय गुरूदेव साक्षी स्वतंत्र

जय गुरू व्यापक भीतर बाहर

जय गुरूदेव जय गुरूदेव 

जय गुरू राम जय गुरू राम ....


जय गुरू तत्वमसि पद तुरिया

जय गुरू ईश एक रस भरिया

जय गुरू शब्दातीत शुद्ध चेतन

जय गुरू पूर्णानंद पुरुषोत्तम

जय गुरू ज्ञान ध्यान विज्ञाना

जय गुरू भक्ति मुक्ति के दाता

जय गुरू जप तप वेद पुराणा

जय गुरू ब्रह्म रूप भगवाना


जय गुरू आद्य निरंजन ईश्वर

जय गुरू पारब्रह्म परमेश्वर

जय गुरूदेव जय गुरूदेव (२)

जय गुरू राम जय गुरू राम (२)

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मेरे गुरू का द्वार

 मेरी किस्मत में लिख दे,एक तू लिख़ने वाले

मेरा तन मन धन अर्पण,करूँ गुरू के हवाले

हुआ जो तू गुरू का,फिर क्यों चिंता पा ले

सुने फर्याद सबकी,साँई मोटेरा वाले

कोई जाए मथुरा कोई काशी कोई जाए हरिद्वार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

मेरे गुरू का द्वार, मेरे गुरू का द्वार...


गुरू के नाम से मिटती हैं जीवन की सारी समस्या

गुरू के ध्यान से बढ़कर हैं न कोई और तपस्या

गुरुचरणों की धूल ही मेरे माथे का श्रृंगार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

कोई जाए मथुरा कोई काशी कोई जाए हरिद्वार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

मेरे गुरू का द्वार, मेरे गुरू का द्वार...


किसीको नाम की चाहत,कोई हैं चाम का दीवाना

किसीको धन का लालच ,कोई इन सबसे बेगाना

किस्मत वालों को मिलता गुरुनाम दान उपहार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

कोई जाए मथुरा कोई काशी कोई जाए हरिद्वार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

मेरे गुरू का द्वार, मेरे गुरू का द्वार...


जिसने तुझको सताया तू मंगल उसका भी चाहे

ये कैसा हैं बाबा जो हरदम मुस्कुराए

एक झलक जोगी की देती बिगड़ा भाग्य सँवार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

कोई जाए मथुरा कोई काशी कोई जाए हरिद्वार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

मेरे गुरू का द्वार, मेरे गुरू का द्वार...


जग की सेवा में जिसने अपना जीवन ही लुटाया

इस दुनिया ने उसपर ही झूठा इल्जाम लगाया

क्यों मिलता वनवास राम को हर युग में हर बार 

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

कोई जाए मथुरा कोई काशी कोई जाए हरिद्वार

मुझे प्यारा हैं नाम गुरू का और गुरू का द्वार

मेरे गुरू का द्वार, मेरे गुरू का द्वार...


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भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले

 मातृ-पितृ पूजन की राह दिखाने वाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगाने वाले


कलियुग में सतयुग को मोड़ के लानेवाले

भला हो तेरा नींद से हमें जगानेवाले


संयम शिक्षा का ज्ञान देके चमकाने वाले

रोग-शोक-भय मुक्त समाज बनाने वाले

घर-घर पावन प्रेम की सरिता बहाने वाले

भला हो तेरा सच्ची राह दिखाने वाले

जन-जन के जीवन में प्रभुरस लाने वाले

मातृ-पितृ पूजन की राह दिखाने वाले

भला हो तेरा ,भला हो तेरा 

भला हो तेरा सच्ची राह दिखाने वाले


टूटे बिखरे परिवारों को मिलाने वाले

करके अथक प्रयास धरा महकाने वाले

मात-पिता का खोया मान दिलाने वाले

भला हो तेरा सत्य का मार्ग बताने वाले

पूजन से बच्चों का ह्रदय खिलाने वाले

मातृ-पितृ पूजन की राह दिखाने वाले

भला हो तेरा ,भला हो तेरा 

भला हो तेरा ज्ञान की गंगा बहाने वाले

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गुरु की सेवा साधु जाने

गुरु की सेवा साधु जाने, गुरुसेवा कहाँ मूढ पिछानै।


गुरुसेवा सबहुन पर भारी, समझ करो सोई नरनारी।।


गुरुसेवा सों विघ्न विनाशे, दुर्मति भाजै पातक नाशै।


गुरुसेवा चौरासी छूटै, आवागमन का डोरा टूटै।।


गुरुसेवा यम दंड न लागै, ममता मरै भक्ति में जागे।


गुरुसेवा सूं प्रेम प्रकाशे, उनमत होय मिटै जग आशै।।


गुरुसेवा परमातम दरशै, त्रैगुण तजि चौथा पद परशै।


श्री शुकदेव बतायो भेदा, चरनदास कर गुरु की सेवा।।

ॐ

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जिन्ह सद्गुरु मिल जाए

 जिन्ह सद्गुरु मिल जाए

तिन भगवान मिलो न मिलो


 जिन्ह सद्गुरु की सेवा कियो

तिन तीरथ व्रत कियो न कियो


जिन्ह सद्गुरु को प्यार कियो

तिन प्रभु को प्यार कियो न कियो


जिन्ह आत्मदेव को जान लियो

तिन वेदों को जान लियो न लियो


जिन्ह आत्मज्ञान में स्नान कियो

तिन गंगा में स्नान कियो न कियो


जिन्ह खुद ही खुद को जान लियो

तिन खुदा को जान लियो न लियो


जिन्ह सद्गुरु मिल जाए

तिन भगवान मिलो न मिलो

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जय गणेश देवा आरती

 जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा


जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

बुद्धि के देवता विघ्नों के हर्ता


संयम तुम्हारा देवा सबसे हैं ऊँचा

धीर हो गंभीर देवा तुमसा न दूजा

मातृ-पितृ भक्ति देना गुरू प्रीति देना

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा


जय गुरुदेवा जय गुरुदेवा 

ब्रम्हा और विष्णु तुम्ही महादेवा


शक्ति भक्ति मुक्ति गुरू ज्ञान के प्रदाता

सद्गुण निखारे गुरू आनंद के दाता

दोषों को मिटाना गुरू-श्रद्धा बढाना

जय गुरुदेवा जय गुरुदेवा

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा


योग ध्यान नित्य करें स्वस्थ रहे काया

हरि ॐ जपते रहे दिव्य बने आभा

ब्रम्हज्ञान हमको मिले और गुरूसेवा

जय गुरूदेवा जय गुरूदेवा

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा


संस्कृति की रक्षा करें ऐसा वर देना

संतो की महिमा हमें सबको बताना

विश्व गुरू भारत हो बापू ने ठाना

आएगा बापू के बच्चों का जमाना

जय गुरूदेवा जय गुरूदेवा

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा

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तेरे तन मन धन की तपस्या

 ऐ मेरे सद्गुरु प्यारे

तेरा जन्म है कैसा रूहानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


जब हम बैठे थे सुखों में

तू सुखा रहा था तन को

जब हम बैठे थे घरों में

तू भुला रहा था मन को

जग में रहकर सब भूला

न भोजन चाहा न पानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


गुरू दर पर सेवा थे करते

हाथों से खून था बहता

पर गुरू सेवा में तत्पर

इस देह का भान था भुलता

संकल्प यही बस दृढ़ था 

गुरू आज्ञा प्रथम निभानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


गुरूदेव के प्रेम की खातिर

हर दिन सहते थे तितिक्षा

दिन रैन वो ज्वाला से थे

हर पल थी अग्नि परीक्षा

हर मूल्य पे लक्ष्य को पाना

ये बात थी मन में ठानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


नगरसेठ कहलाने वाला 

गुरुदर पे मरता मिटता

तेरी मर्जी पूरण हो

ये ध्यान हृदय में धरता

बस निराकार ने थामा

न होने दी कुछ हानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


वो कैसी रातें होंगी

प्रभुप्रेम में तू जब रोया

दुनिया थी नींद में सोती

तू अपने आप में खोया

अति दिव्य हैं और अलौकिक

तेरी महिमा न जाए बखानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


माँ का आँचल बिसराया

पत्नी का प्रेम ठुकराया

किन किन राहों पे चलके

इस ब्रह्मज्ञान को पाया

फिर आत्म में ही रहा तू

चालीस दिन की वो निशानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


था आसोज सुद दो दिन

और संवत बीस इक्कीस

मध्यान्ह ढाई बजे 

मिल गया ईश से ईश

पानी में मिल गया पानी

फिर दोनों हो गए फानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


ये रोशनी कैसी हैं फूटी

जग गई हैं सारी धरती

अंबर भी प्रकाश से फूटा

नस-नस में ज्योति भर दी

सब जड़ और चेतन जागा

लगे संत की बात फैलानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


गुरू सत्य का रस पिलाया

तन मन हृदय में समाया

हर नस-नस में पहुँचा वो

हर रूह को ॐ जपाया

वो रस मे ऐ मेरे सद्गुरु प्यारे

तेरा जन्म है कैसा रूहानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


हर तरफ हैं आत्म दर्शन

हर तरफ हैं नूर नूरानी

हर तरफ हैं तेरा उजाला

हर तरफ हैं तू ब्रह्मज्ञानी

सदियों तक जो गूँजेगी

हैं आज की तेरी कहानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


दरिद्र नारायण की सेवा करते

हैं अपना आपा लुटाया

गली -गली गाँव में जाकर

सबको ही सुख पहुँचाया

हैं विश्व शिखर पर चमका

भारत का रत्न नूरानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


हम ना भूलें उस तप को

कैसे तूने गुरू को रिझाया

किन-किन राहों पे चलके

इस ब्रह्मज्ञान को पाया

जन्मों की तपन मिटाए

ये ब्रह्म को छूती वाणी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


इन कठिन पलों में भी तू

किस शान से हैं मुस्काया

जग को सत राह दिखाई

कष्टों में तन को तपाया

रो-रो इतिहास कहेगा

दी तूने जो कुर्बानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


सारी सृष्टि को उखाड़े

जब गुरू शेर हैं दहाड़े

इतना कुछ होने पर भी

ना जाने मौन क्यों धारे

दुनिया ने इतना सताया

फिर भी मुस्काए ज्ञानी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


संस्कृति के रक्षक को ही

दुनिया ने जेल पहुँचाया

झूठे इल्जाम लगाकर

देखो संत को कैसे सताया

सूरज को कौन ढँकेगा

वो स्वयं प्रकाश का स्वामी

तेरे तन मन धन की तपस्या

तेरे जीवन की कुर्बानी


ऐ मेरे सद्गुरु प्यारे

तू दे रहा कैसा इशारा

जैसा तू ब्रह्म में स्थित हैं

वैसा हो बोध हमारा...

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ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी

 ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी 

परम गुरु और परमपिता परम दयालु स्वामी


सन १९४१ में आसूमल अवतारे

महँगीबा और थाऊमल के प्यारे बाल दुलारे

शुरू हो गई इस कलियुग में नए युग की कहानी

ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी ...


बाल्यकाल से ही बापू में अद्भुत तेज समाया था

प्राणीमात्र के कारण हेतू योगी पुरूष एक आया था

स्थापित होने वाली थी ये संतों की भविष्यवाणी

ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी ...


मोहमाया के सभी आवरण बापू ने उतारे हैं

सदैव सम और प्रसन्न रहना बापू के ही नारे हैं

साधना की अनुपम मस्ती बापू ने पहचानी

ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी ...


परम पूज्य लीलाशाहजी के श्रीचरणों की सेवा में

आत्मसाक्षात्कार हो गया नाम आ गया देवों में

भारत विश्वगुरु बन जाए बापू ने ये ठानी

ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी ...


साबरमती के तट बापू ने भक्तों से श्रमदान लिया

संत श्री आशारामजी आश्रम आगे चल के नाम हुआ

बापू के यश की गाथा को कैसे कहे जुबानी

ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी ...

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सबकुछ पा लिया गुरू के द्वार से

 सबकुछ पा लिया गुरू के द्वार से

सर को झुका लिया गुरू के द्वार पे



बीच भँवर में मेरी नैय्या न छोड़ना

तन से हो जितनी दूरी मन से न करना

जिंदगानी हो दाता तेरे ही नाम की

सबकुछ पा लिया तेरे दीदार से

सबकुछ पा लिया गुरू के द्वार से...


भक्ति का दान देना श्रद्धा अपार देना

ये दुनिया भूल भुलैय्या मुझको उबार लेना

फँस न जाए हम इस मजधार में

सबकुछ पा लिया गुरू के द्वार से...


दर तेरा पाया जिसने भाग्य बनाया

उजड़े चमन को तूने फिर से खिलाया

ये अँखियाँ तरस गई तेरे इंतजार में

सबकुछ पा लिया गुरू के द्वार से

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ऐ जीवन प्राण हमारे

 ऐ जीवन प्राण हमारे 

बापू हम सबके प्यारे

हम सबके पास अब आओ

हर साधक तुम्हें पुकारें


हम रहते आस लगाए

बापू जल्दी आएँगे

अपने सद्गुरु का दर्शन

अति निकट से हम पाएँगे

पर समय बीतता जाता

हम किसके रहे सहारे

हम सबके पास अब आओ

हर साधक तुम्हें पुकारें

ऐ जीवन प्राण हमारे ...


हम सब बालक हैं तेरे

तुम हम सबके स्वामी हो

हम सबकी वेदना समझो

तुम तो अन्तर्यामी हो

निरुपाय यहाँ हैं सारे

अब आप ही संकट तारे

हम सबके पास अब आओ

हर साधक तुम्हें पुकारें

ऐ जीवन प्राण हमारे ...


हैं निजानंद में रमते

शाश्वत चैतन्य को पाया

निर्लेप आप हैं सबसे

हैं अद्भुत आपकी माया

लीला विस्तार समेटो

हैं परेशान हम सारे

हम सबके पास अब आओ

हर साधक तुम्हें पुकारें

ऐ जीवन प्राण हमारे ...


सूझता मार्ग ना कोई

क्या करें समझ न आता

अब जल्दी दर्शन दे दो

मन सबका तुम्हें बुलाता

आँसुओं की धारा से हम

सद्गुरु के चरण पखारे

हम सबके पास अब आओ

हर साधक तुम्हें पुकारें

ऐ जीवन प्राण हमारे ...

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विनती सुनिए नाथ हमारी

 विनती सुनिए नाथ हमारी 

ह्रदयेश्वर हरि हृदय विहारी

मोर मुकुट पीताम्बरधारी

विनती सुनिए नाथ हमारी ...


जनम जनम की लगी लगन है

साक्षी तारों भरा गगन हैं

गिन गिन श्वास श्वास कहती हैं

विनती सुनिए नाथ हमारी ...


सतत प्रतीक्षा अपलक लोचन

हैं भव बाधा विपत्ति विमोचन

स्वागत का अधिकार दीजिए

शरणागत हैं नयन पुजारी

विनती सुनिए नाथ हमारी ...


और कहूँ क्या अंतर्यामी

तन मन धन प्राणों के स्वामी

करुणा कर आकर ये कहिए

स्वीकारी बिनती स्वीकारी

विनती सुनिए नाथ हमारी ...

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तू बंदे क्या जाने

 तू बंदे क्या जाने बापू के चमत्कारों को

बापू के चमत्कारों को गुरुवर चमत्कारों को


वो हरे करे सुखों को मेवा बाँटे भूखों को

वो भक्ति का रंग लगाएँ ब्रह्मज्ञान का पान कराए

उस भक्ति को,उस शक्ति को कोई सुलझी आँख पहचाने

तू बंदे क्या जाने...



गर जीवन सागर तरना तूफानों से क्या डरना

गुरुवर की रजा में जीना गुरुवर की रजा में मरना

तू सुमिरन कर और जीवन भर माने जा उसके कहने

तू  बंदे क्या जाने...


ये सुख दुःख ऐसे गहने जो हर एक के संग रहने

ये दर्द जुदाईयोँ वाले सह ले जो पड़ गए सहने

बदलेगा समा तू जप ले नाम आएँगे खुद से मिलाने 

तू बंदे क्या जाने...


तू जो कर्म कमावै समझे कोई देख न पावै

बापू के नैन हजारों उसे सबकुछ नजर हैं आवै

जो गुरू कहे वो सेवा करें वो भक्त स्वरूप में जागे

बापू के चमत्कारों को

तू बंदे क्या जाने...

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गुरुदेव तुमको पाकर

 गुरुदेव तुमको पाकर धन्य धन्य हुआ ये जीवन

तुम्हरी कृपा को पाकर मंगल हुआ ये जीवन


बड़े भाग हमने पाए अवतरण हुआ जो जग में

अंधकारमय था जग यह कही आशा न थी दिल में

कोटि पुकार सुनकर बापू पधारे जग में

गुरुदेव तुमको पाकर...


कलियुग के विकट समय में दुष्कर हुआ था जीवन

छाई हुई उदासी हर ओर खड़ी उलझन

नई आशा की किरण बन अवतरण लिया धरा पर

गुरुदेव तुमको पाकर...


करुणा के तुम हो सागर भर भर पिलाते गागर

कोई कैसा भी पतित हो उसे थाम लेते गुरुवर

कईं बार जो पधारे दिया भक्ति ज्ञान गुरुवर

गुरुदेव तुमको पाकर...

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चंदन का ‌पलना रेशम की डोर

 चंदन का ‌पलना रेशम की डोर

झूले रे झूले मेरा महंगिबा किशोर ...

नन्हे नन्हे पग हैं छोटे छोटे हाथ
माथे पे टीका महंगिबा का साथ
बडा नटखट हैं बडा चितचोर
झूले रे झूले मेरा महंगिबा किशोर ...

शुभ दिन आया खुशियाँ लाया
सब भक्तों ने मंगल बनाया
हर तरफ हैं खुशियाँ हर तरफ हैं शोर
झूले रे झूले मेरा महंगिबा किशोर ...

महंगिबा के घर हैं आनंद छाया
थाऊमल के द्वारे लाल हैं जाया
बधाई हो बधाई हो लख लख बधाई हो
बापूजी के जन्म की लख लख बधाई हो
बधाई हो बधाई हो लख लख बधाई हो ...
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मेरे बापू

योगी तेरा ही ध्यान धरे ,करे भक्त पूजा उपवास
निराकार परब्रह्म वो बापू बनकर करे विलास
सपना जगत हैं एक आभास , आश्रम हो या कारावास
जब जब बापू तुम्हे पुकारा तुमको पाया अपने पास
मेरे बापू मेरे बापू मेरे बापू प्यारे बापू ...



दर्शन को तेरे ये तरसे, दो नैना दिन रात हैं बरसे
तूने ही सेवा की हमारी समझ गया अब जागा भ्रम से
मैं बालक तू मेरा पिता , तेरे वचन ही शास्र गीता
वही समय बस सफल हुआ जो तेरी यादों में हैं बीता
मेरे बापू मेरे बापू मेरे बापू प्यारे बापू ...



जानता हूँ ये राज की बात तू हैं मेरे हरदम साथ
क्यों करूँ मैं चिंता कल की जब हैं सर पर तेरा हाथ
सारे देव और तीरथ धाम करते बापू तुम्हें प्रणाम
जिसमें तेरी रजा न हो हम करें कभी न ऐसे काम
मेरे बापू मेरे बापू मेरे बापू प्यारे बापू ...



तपते दिल को मिले सावन, गुरु द्वार हैं ऐसा अति पावन
जी चाहे देखा ही करूँ, गुरू मूरत इतनी मनभावन
गाऊँ क्या तेरा गुणगान , बापू तू मेरा अभिमान
तेरे चरणों में ही रहना जबतक मेरे तन में प्राण
मेरे बापू मेरे बापू मेरे बापू प्यारे बापू ...



योगी तेरा ही ध्यान धरे ,करे भक्त पूजा उपवास
निराकार परब्रह्म वो बापू बनकर करे विलास
सपना जगत हैं एक आभास , आश्रम हो या कारावास
जब जब बापू तुम्हे पुकारा तुमको पाया अपने पास
मेरे बापू मेरे बापू मेरे बापू प्यारे बापू ...

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भरोसा मेरा नहीं हारेगा

गुरू मेरे ,गुरू मेरे, दाता मेरे, साँई मेरे

भरोसा मेरा नहीं हारेगा हैं भरोसा मुझे
गुरू मेरे, गुरू मेरे...

अपनों का बदल जाना दुनिया का हैं दस्तूर
अपनों को निभाने में मेरा गुरू बडा मशहूर
गुरू मेरे, गुरू मेरे, दाता मेरे, साँई मेरे
मेरा भी जीवन तू सँवारेगा हैं भरोसा मुझे
गुरू मेरे, गुरू मेरे...

इतिहास गवाह हैं ये जब जिसने पुकारा हैं
जीता हैं भरोसा ही जब गुरू सहारा हैं
गुरू मेरे, गुरू मेरे, दाता मेरे, साँई मेरे
मेरा भी जीवन तू सँवारेगा हैं भरोसा मुझे
मेरा भी गुलशन तू निखारेगा हैं भरोसा मुझे
गुरू मेरे, गुरू मेरे...

जो कुछ था पास मेरे सब अर्पण कर डाला
अब हाथ उठा करके समर्पण कर डाला
गुरू मेरे, गुरू मेरे, दाता मेरे, साँई मेरे
मेरा भी जीवन तू सँवारेगा हैं भरोसा मुझे
गुरू मेरे, गुरू मेरे...

अपनों का बदल जाना दुनिया का हैं दस्तूर
अपनों को निभाने में मेरा गुरू बडा मशहूर
मुझे भी अपना तू बनाएगा हैं भरोसा मुझे
गुरू मेरे ,गुरू मेरे ,दाता मेरे ,साँई मेरे
भरोसा मेरा नहीं हारेगा हैं भरोसा मुझे
मेरा भी जीवन तू सँवारेगा हैं भरोसा मुझे
गुरू मेरे, गुरू मेरे...

गुरुदेव तुम्हारे चरणों में

गुरुदेव तुम्हारे चरणों में वैकुंठ का वास लगे मुझको

अब तो तेरे ही रूप में बस रब का एहसास लगे मुझको

अमृत चरणों का देके मुझे पापी से पावन कर डाला
मेरे सिर पर हाथ फिरा कर के मुझे अपने ही रंग डाला
इस जीवन की बिल्कुल ही न थी जैसे शुरूआत लगे मुझको
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में...

मैं किस पे भला अभिमान करूँ ये हाड मास की काया हैं
सोना चाँदी हीरे मोती बस चार दिनों की माया हैं
गुरुदेव ने ऐसा ज्ञान दिया दुनिया वनवास लगे मुझको
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में...

मैंने नाम गुरू का लिख डाला हर साँस पे हर एक धड़कन पे
केवल अधिकार गुरू का हैं अब तो बच्चों के जीवन पे
गुरुदेव बिना कुछ भाता नहीं ऐसा आभास लगे मुझको
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में...

स्वागतम गुरुदेव शरणागतम गुरुदेव...
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ ....

फरयाद मेरी सुनके

फरयाद मेरी सुनके गुरूदेव चले आना

नित ध्यान धरू तेरा तुम दरश दिखा जाना

तुम्हे अपना समझकर के फरयाद सुनाता हुँ
तेरे दर पे आकर के नित शीश झुकाता हुँ
क्यो भूल गए गुरूवर मुझे समझ के बेगाना
फरयाद मेरी सुनके...

मेरी नाव भँवर डोले बापू तुम ही खेवैया हो
मेरी जीवन नैया के तुम कृष्ण कन्हैया हो
तुम  सूक्ष्म रूप धर के भव पार लगा जाना
फरयाद मेरी सुनके...
हरि ओम हरि ओम हरि ओम ...

गुरुदेव तुम्हारे बिन

गुरुदेव तुम्हारे बिन अब काैन हमारा है

स्वार्थ की ये दुनिया है बस तेरा सहारा है


गुरुदेव मेरी नैया मजधार में ना अटके
चरणों में जगह दे दो मिल जाये किनारा है
गुरुदेव तुम्हारे बिन ....

कभी आके हँसातेे हो कभी जाके रुलाते हो
भक्तों के लिए भगवन ये खेल तुम्हारा है
गुरुदेव तुम्हारे बिन ....

तुम हो समरथ दाता मेरे भाग्यविधाता हो
भक्तों के लिए भगवन दरबार तुम्हारा है
गुरुदेव तुम्हारे बिन ....

माता पिता विशेष गीत- जिसे खुद के सुखों की कोई चाह नही

 जिसे खुद के सुखों की कोई चाह नही

मेरे जीवन बिन जिसकी कोई राह नही।।धृ।।

वार दे मुझपे दुनिया का प्यार वो

मेरे माता पिता सम प्यार नही

जिसे खुद के सुखों की कोई चाह नही


सुख का दरिया प्यार का सागर

मेरी माँ है ममता की गागर 

सीने से लगाकर दूध है पिलाया

लोरी गाकर है सुलाया

थक हार जाए घर के काम मे

फरियाद ना रखती होठों पर

जिसे खुद के सुखों की परवाह नही

घर की डोरी बंधी है मेरी माँ से ही

वार दे मुझपे दुनिया का प्यार वो

मेरे माता पिता सम प्यार नही


हिंमत देते राह दिखाते 

हारी बाजी पिता है जिताते

गम से भरी हुई अंधेरी रातों मे

आशा की लौ जगाते

रखते वो मन में ही वेदना और

आँखों से प्रेम छलकाते

जिसे खुद के सपनों का ख्याल नही

दिया सबकुछ है फिर भी अभिमान नही

वार दे मुझपे दुनिया का प्यार वो

मेरे माता पिता सम प्यार नही


मात पिता की महिमा बताए

भूले भटके को राह दिखाए

गुरु है सहारा सच्चा इस दुनिया में 

भव दुःख से पार लगाए

ईश्वर दिखे जिसके ज्ञान से

गुरु आत्म तत्व में जगाए

गुरु के चरणों के बिन उद्धार नही 

गुरु महिमा का कोई पार नही

वार दे मुझपे दुनिया का प्यार वो

गुरु माता पिता सम प्यार नही

जिसे खुद के सुखों की कोई चाह नही...

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मात पिता है देव मेरे - मातृ पितृ देवो भव

 मात पिता है देव मेरे और 

गुरु मेरे भगवान है

भूल न जाना हे मानव तू

ईश्वर की संतान है

मातृ पितृ देवो भव


चलते चलते रुक ना जाना

तेरा है यह काम नही

आदर्शों को भूल गया तो

तुमसा ना नादान कहीं

सदाचार की गंगा बहती

ऐसा हिंदुस्तान हैं

भूल न जाना हे मानव तू

ईश्वर की संतान है

मातृ पितृ देवो भव


श्रवण की मातृ भक्ति को देखो

ऐसी वो मशाल है

मिट ना सकता जल ना सकता

ऐसा बेमिसाल है

अच्छी सीख लेना ही प्यारे

जीवन बने महान है

भूल न जाना हे मानव तू

ईश्वर की संतान है

मातृ पितृ देवो भव


माँ की ममता का छाया है

गुरुवर के ही प्यार में

बचा लिया है मेरी नाव को

बीच भँवर मझधार से

हम तो बापूजी के बच्चे

हमको तो अभिमान हैं

भूल न जाना हे मानव तू

ईश्वर की संतान है

मातृ पितृ देवो भव

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पूजन करूंँ मैं माता पिता का

 पूजन करूंँ मैं माता पिता का

निज संस्कृति अपनाऊ मैं

गुरुवर के संकेत वे चलकर 

जीवन सफल बनाऊँ मैं


तिलक लगाऊँ हार पहनाऊँ

मेरी प्यारी मैया को 

दीप जलाऊँ पुष्प चढाऊँ

वंदन करता हूँ उनको

भारत पुण्य धरा की महिमा 

निज आदर्श बनाऊँ मैं 

पूजन करूंँ मैं माता पिता का...


शीश झुकाऊँ फेरे लगाऊँ

आपका आशिष पाऊँ मैं

तन मन अर्पित जीवन मेरा

चरणों मैं ही लगाऊँ मैं

कर्ज है मुझपर मात पिता का

कैसे उसे चुकाऊँ मैं 

पूजन करूंँ मैं माता पिता का...


जिस माँ ने हमें नाै मास तक

गर्भ में बहुत संभाला है

जीवन के ‌सुख दुःख सहकर भी

कैसै हमको पाला है

मात पिता गुरु चरणों में ही

मेरे चारों धाम हैं 

पूजन करूंँ मैं माता पिता का...


गीले मे खुद सोकर मुझको

सूखे मे ही सुलाया है

भूखे रहकर उसने मुझको

अपना कौर खिलाया है 

उस माँ का ऋण कैसै चुकाऊँ

माँ ममता की खान है

पूजन करूंँ मैं माता पिता का...


जीवन में सबकुछ मिल जाएँ 

मात पिता ना मिलते है

मात पिता गुरु की सेवा से

किस्मत रेखा बदले है

उनकी आज्ञा में चलना ही 

मेरा सच्चा धर्म हैं

पूजन करूंँ मैं माता पिता का


बापू ने लीलाशाह जी की 

सेवा कर यह पद पाया

ब्रह्मज्ञान को हँसते गाते

हम सबको है सिखलाया

लाखों मिलते मात पिता दिल

तब सदगुरु दिल बनता हैं

पूजन करूंँ मैं माता पिता का...

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ॐ जय जय माता पिता

 ॐ जय जय मात पिता 

प्रभु गुरूजी मात पिता

सद्भाव देख तुम्हारा 

मस्तक झुक जाता

ॐ जय जय माता पिता 


कितने कष्ट उठाए

हमको जनम दिया

मैय्या पाला बड़ा किया

सुख देती दुःख सहती

पालनहारी माँ

ॐ जय जय माता पिता 


अनुशासित कर आपने

उन्नत हमें किया

पिता आपने जो हैं दिया

कैसे ऋण मैं चुकाऊँ

कुछ न समझ आता

ॐ जय जय माता पिता 


सर्वतीर्थमयी माता

सर्वदेवमय पिता

ॐ सर्वदेवमय पिता

जो कोई इनको पूजें

पूजित हो जाता

ॐ जय जय माता पिता 


मात पिता की पूजा

गणेशजी ने भी की

श्री गणेशजी ने भी की

सर्व प्रथम गणपति को

ही पूजा जाता

ॐ जय जय माता पिता


बलिहारी सद्गुरु की

मारग दिखा दिया

सच्चा मारग दिखा दिया

मातृ पितृ पूजन कर

जग जय जय गाता

ॐ जय जय माता पिता


मातृ पितृ गुरू की

आरती जो गाता

है प्रेम सहित गाता

वो संयमी हो जाता

सदाचारी हो जाता

भव से तर जाता

ॐ जय जय माता पिता


लफंगे लफ़ंगियों की नकल छोड़

गुरूसा संयमी होता

गणेशजी सा संयमी होता

स्वयं आत्मसुख पाता

औरों को पवाता

ॐ जय जय माता पिता


ॐ जय जय माता पिता 

प्रभु गुरूजी माता पिता

सद्भाव देख तुम्हारा 

मस्तक झुक जाता

ॐ जय जय माता पिता

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सतगुरू तुम्हारी यादें

 सतगुरु तुम्हारी यादें पल पल रुला रहीं हैं

कब आओगे ये अँखियाँ आँसू बहा रहीं हैं

चिट्ठी न कुछ संदेशा पैगाम कुछ न तेरा
वीरान हो गए हम तड़प रहा मोटेरा

मंजिल नही कोई अब हमें नज़र आ रही है
कब आओगे ये अँखियाँ आँसू बहा रहीं हैं

खो गयी हँसी हमारी छिन गए सभी उजाले
किसको दिखाए सतगुरू अपने ये दिल के छाले

कुछ तो जुदाई तेरी कुछ दुनिया सता रही है
कब आओगे ये अखियाँ आँसू बहा रही है

बेजान हो गयी है अब ज़िंदगी हमारी
बेचैन रोज करती यादें हमें तुम्हारी

आ जाओ अब तो सतगुरु साधक बुला रहे हैं
कब आओगे ये अँखियाँ आँसू बहा रहीं हैं

गुरूदेव मेरा जीवन

 गुरूदेव मेरा जीवन 

तेरे प्यार के लिए हो

जिंदगी हो लेकिन 

उपकार के लिए हो

उपकार के लिए हो

 तेरे प्यार के लिए हो

उपकार के लिए हो

 तेरे ज्ञान के लिए हो

तेरे नाम के लिए हो

गुरूदेव मेरा जीवन 

तेरे प्यार के लिए हो


हरि नाम की लगन हो 

भक्ति में मन मगन हो

चाहे हमारी नैय्या 

संसार में फँसी हो

गुरूदेव मेरा जीवन

 तेरे प्यार के लिए हो

तेरे नाम के लिए हो

गुरुधाम के लिए हो


मेरे मन मंदिर में गुरूवर

तुम ज्ञान की ज्योत जला दो

मेरे प्राण भी न्यौछावर

गुरूद्वार के लिए हो

गुरूदेव मेरा जीवन 

तेरे प्यार के लिए हो


तेरा नाम हर पल गाँऊ

तेरी भक्ति में खो जाऊँ

वाणी हो जो मेरी 

गुणगान के लिए हो

गुरूदेव मेरा जीवन 

तेरे प्यार के लिए हो

जिंदगी हो लेकिन 

उपकार के लिए हो

उपकार के लिए हो

 तेरे ज्ञान के लिए हो

गुरूदेव मेरा जीवन 

तेरे प्यार के लिए हो

गुरूनाम के लिए हो

गुरुद्वार के लिए हो

तेरे प्यार के लिए हो

साँई आ जाओ एक बार

 मेरे प्राणों का आधार

बापू आ जाओ एक बार

साधक की यही पुकार

साँई आ जाओ एक बार

मेरे प्राणों का आधार

बापू आ जाओ इस बार

साधक की यही पुकार

साँई आ जाओ इस बार


मेरी सुनकर करुण पुकार

बापू आ जाओ एक बार


तेरी याद में अँखियाँ हैं छलकी

जीवन की घड़ियाँ कुछ पल की

हो जाए तेरा दीदार

साँई आ जाओ एक बार

बापू आ जाओ एक बार


तेरी प्यारी जो मुस्काने हैं

हम सब उसके दीवाने हैं

तेरे दरश का हैं इंतजार

बापू आ जाओ इस बार


दुनिया में ऐसा कोई नहीं

जो मेरी पीड़ा समझेगा

वर्षों दर्शन बिन बीत गए

साधक कैसे रह पाएगा

मेरी पीड़ा हरो दातार

कुछ किरपा करो दातार

बापू आ जाओ एक बार


मेरे प्राणों का आधार

साधक की करूण पुकार

बापू आ जाओ एक बार


तेरी विरह में नीर बहाते हैं

अपनी पीड़ा को छिपाते हैं

तुझे याद करे हैं दिन रात 

बापू आ जाओ एक बार

साँई आ जाओ एक बार


ये प्यासा मन मेरा तरस रहा

बिन सावन के ये बरस रहा

क्यों तरसाते हर बार

क्यों तड़पाते हर बार

बापू आ जाओ इस बार


मेरे प्राणों का आधार

साँई आ जाओ एक बार

मेरी सुनकर करुण पुकार

हैं सब साधक की पुकार

बापू आ जाओ एक बार

Audio


जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

 जय गणेश जय गणेश,

जय गणेश देवा ।

माता जाकी पार्वती,

पिता महादेवा ॥


एक दंत दयावंत

चार भुजा धारी ।

मस्तक सिंदूर सोहे

मूसे की सवारी ॥


दुःखियों के दुःख हरो

दया करो देवा ।

माता जाकी पार्वती,

पिता महादेवा ॥


अंधन को आंख देत,

कोढ़ियन को काया ।

बांझन को पुत्र देत,

निर्धन को माया ॥


दुःखियों के दुःख हरो

दया करो देवा ।

माता जाकी पार्वती,

पिता महादेवा ॥


लडुवन को भोग लगे

संत करें सेवा

संत करें सेवा


जय गणेश जय गणेश,

जय गणेश देवा ।

माता जाकी पार्वती,

पिता महादेवा ॥

Audio

आज गुरू के दर्शन कर लो

 आज गुरू के दर्शन कर लो

खुशियों से झोली को भर लो

गुरू ज्ञान जीवन में भर लो

अपना हित सब साधक कर लो

आज गुरू के दर्शन कर लो...


शबरी मीरा एकलव्य को

गुरुभक्ति ने तारा

आरुणि और ध्रुव को भी था

गुरू का मिला सहारा

ऐसे गुरूवर हमको मिले हैं

सद्गुरू की भक्तों कर लो


शुभ दर्शन गुरूवर के पाकर

मन का हर संताप मिटे

गुरूवाणी सुनने से कितने

जन्मों के हैं पाप कटे

गुरू ही पूरण ब्रह्म हैं भक्तों

गुरूप्रेम ह्रदय में भर लो


गुरू की मूरत अति निर्मल हैं

सबका मन मोह लेती हैं

गुरू चरणों की धूली पावन

बिगड़ी बना ये देती हैं

गुरू ही सारे तीरथ मंदिर

गुरू दर पे तुम सजदा कर लो


मोहमाया के रिश्ते सारे

चार दिनों का मेला हैं

गुरू बिना नहीं कोई साथी

जाना तुझे तो अकेला हैं

गुरूवर का दामन लेकर

भवसागर से तुम तो तर लो

आज गुरू के दर्शन कर लो...

Audio

राम बने कभी कृष्ण बने

 राम बने कभी कृष्ण बने 

कभी साँई आसाराम हैं

पारब्रह्म परमेश्वर तुमको 

बारंबार प्रणाम हैं


अलख निरंजन निराकार

साकार रूप में आया हैं

फैला हैं आलोक दिशाओं में

अमृत सरसाया हैं

धन्य धन्य भारत की धरती

लीला अति अभिराम हैं

पारब्रह्म परमेश्वर तुमको 

बारंबार प्रणाम हैं


हिमगिरि से सागर तक

तेरी ही करुणा की छाया हैं

काम रूप से पंच नदी तक

तुमने रस बरसाया हैं

गूँज रहा धरती के कण कण में

पावन हरि नाम हैं

पारब्रह्म परमेश्वर तुमको 

बारंबार प्रणाम हैं


अमी दृष्टि बरसाकर पल में

लाखों का उद्धार किया

दीन दुःखी कातर अनाथ का

तुमने बेड़ा पार किया

द्वार तुम्हारे जो भी आता

होता पूरणकाम हैं

पारब्रह्म परमेश्वर तुमको 

बारंबार प्रणाम हैं


मनमंदिर पावन कर अपना

तुझको आज बिठाया हैं

दो नयनों के दीप जलाए

श्रद्धा सुमन चढाया हैं

तेरे चरणों में ही गुरूवर

अपने चारों धाम हैं

पारब्रह्म परमेश्वर तुमको 

बारंबार प्रणाम हैं


गुरुदेव हे गुरुदेव

विश्वशांति का विजय पताका 

लहराए ऐसा वर दो

तृषावन्त मानवता के उर में

फिर से अमृत भर दो 

जगन्नियंता तेरे चरणों में

सच्चा विश्राम हैं

पारब्रह्म परमेश्वर तुमको 

बारंबार प्रणाम हैं

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क्या कहूँ कौनसी दौलत हैं गुरू

 क्या कहूँ कौनसी दौलत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी दुनिया मेरी जन्नत हैं गुरू

क्या कहूँ कौन...


बनाया इसीने जीवन सारा

रोम रोम में इनका ही साया

साया ही नहीं काया हैं मेरी

उपकार हैं इनका श्वासों पर

मेरी पूजा मेरी बरकत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी दुनिया मेरी जन्नत हैं गुरू

क्या कहूँ कौनसी दौलत हैं गुरू...


हम सबको एक प्यार से सींचा

कोई न ऊँचा कोई न नीचा

छाया ही भली महिमा ही भरी 

करें प्रेम शमा संग परवाना

जन्मों जन्मों की इबादत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी पूजा मेरी जन्नत हैं गुरू

क्या कहूँ कौनसी दौलत हैं गुरू...


अंक में सारी सृष्टि समेटी

सुख-दुःख को सम कर के देखी

आँचल के तले जीवन ये पले

वो नर क्या वो तो नारायण

सबको शिव करने की ताकत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी दुनिया...


जन्मों जन्मों की इबादत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी पूजा मेरी जन्नत हैं गुरू


मेरी पूजा मेरी बरकत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी दुनिया...


क्या कहूँ कौनसी दौलत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी दुनिया मेरी जन्नत हैं गुरू


सबको शिव करने की ताकत हैं गुरू

मेरा जीवन मेरी दुनिया मेरी जन्नत हैं गुरू

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ब्रह्म रामायण

 

(1)      हो जा अजर ! हो जा अमर !!

जो मोक्ष है तू चाहता, विष सम विषय तज तात रे।

आर्जव क्षमा संतोष शम दम, पी सुधा दिन रात रे॥

संसार जलती आग है, इस आग से झट भाग कर।

आ शांत शीतल देश में, हो जा अजर ! हो जा अमर !!॥1॥

 

पृथिवी नहीं जल भी नहीं, नहीं अग्नि तू नहीं है पवन।

आकाश भी तू है नहीं, तू नित्य है चैतन्यघन॥

इन पाँचों का साक्षी सदा, निर्लेप है तू सर्वपर।

निज रूप को पहिचानकर, हो जा अजर ! हो जा अमर!!॥2॥

 

चैतन्य को कर भिन्न तन से, शांति सम्यक् पायेगा।

होगा तुरंत ही तू सुखी, संसार से छुट जायेगा॥

आश्रम तथा वर्णादि का, किञ्चित् न तू अभिमान कर।

सम्बन्ध तज दे देह से, हो जा अजर ! हो जा अमर!!॥3॥

 

नहीं धर्म है न अधर्म तुझमें ! सुख-दुःख भी लेश न।

हैं ये सभी अज्ञान में, कर्त्तापना भोक्तापना॥

तू एक दृष्टा सर्व का, इस दृश्य से है दूरतर।

पहिचान अपने आपको, हो जा अजर ! हो जा अमर !!॥4॥

 

कर्त्तृत्व के अभिमान काले, सर्प से है तू डँसा।

नहीं जानता है आपको, भव पाश में इससे फँसा॥

कर्त्ता न तू तिहुँ काल में, श्रद्धा सुधा का पान कर।

पीकर उसे हो सुखी, हो जा अजर ! हो जा अमर !!॥5॥

मैं शुद्ध हूँ मैं बुद्ध हूँ, ज्ञानाग्नि ऐसी ले जला।

मत पाप मत संताप कर, अज्ञान वन को दे जला॥

ज्यों सर्प रस्सी माँहिं, जिसमें भासता ब्रह्माण्ड भर।

सो बोध सुख तू आप है, हो जा अजर ! हो जा अमर !!॥6॥

 

अभिमान रखता मुक्ति का, सो धीर निश्चय मुक्त है।

अभिमान करता बन्ध का, सो मूढ़ बन्धनयुक्त है॥

'जैसी मति वैसी गति', लोकोक्ति यह सच मानकर।

भव-बन्ध से निर्मुक्त हो, हो जा अजर ! हो जा अमर!!॥7॥

 

आत्मा अमल साक्षी अचल, विभु पूर्ण शाश्वत् मुक्त है।

चेतन असंगी निःस्पृही, शुचि शांत अच्युत तृप्त है॥

निज रूप के अज्ञान से, जन्मा करे फिर जाय मर।

भोला ! स्वयं को जानकर, हो जा अजर ! हो जा अमर !!॥8॥


(2) सुख से विचर !

 

कूटस्थ हूँ अद्वैत हूँ, मैं बोध हूँ मैं नित्य हूँ।

अक्षय तथा निस्संग आत्मा, एक शाश्वत् सत्य हूँ॥

नहीं देह हूँ नहीं इन्द्रियाँ, हूँ स्वच्छ से भी स्वच्छतर।

ऐसी किया कर भावना, निःशोक हो सुख से विचर॥1॥

 

मैं देह हूँ फाँसी महा, इस पाप में जकड़ा गया।

चिरकाल तक फिरता रहा, जन्मा किया फिर मर गया॥

'मैं बोध हूँ' ज्ञानास्‍त्र ले, अज्ञान का दे काट सर।

स्वच्‍छन्द हो, निर्द्वन्द्व हो, आनन्द कर सुख से विचर॥2॥

 

निष्क्रिय सदा निस्संग तू, कर्ता नहीं भोक्ता नहीं।

निर्भय निरंजन है अचल, आता नहीं जाता नहीं॥

मत राग कर मत द्वेष कर, चिन्ता रहित हो जा निडर।

आशा किसी की क्यों करे, संतृप्त हो सुख से विचर॥3॥

 

यह विश्व तुझसे व्याप्त है, तू विश्व में भरपूर है।

तू वार है तू पार है, तू पास है तू दूर है॥

उत्तर तू ही दक्षिण तू ही, तू है इधर तू है उधर।

दे त्याग मन की क्षुद्रता, निःशंक हो सुख से विचर॥4॥

 

निरपेक्ष दृष्टा सर्व का, इस दृश्य से तू अन्य है।

अक्षुब्ध है चिन्मात्र है, सुख-सिन्धु पूर्ण अनन्य है॥

छः ऊर्मियों से है रहित, मरता नहीं तू है अमर।

ऐसी किया कर भावना, निर्भय सदा सुख से विचर॥5॥

 

आकार मिथ्या जान सब, आकार बिन तू है अचल।

जीवन मरण है कल्पना, तू एकरस निर्मल अटल॥

ज्यों जेवरी में सर्प त्यों, अध्यस्त तुझमें चर अचर।

ऐसी किया कर भावना, निश्चिन्त हो सुख से विचर॥6॥

 

दर्पण धरे जब सामने, तब ग्राम उसमें भासता।

दर्पण हटा लेते जभी, तब ग्राम होता लापता॥

ज्यों ग्राम दर्पण माँहि तुझमें, विश्व त्यों आता नजर।

संसार को मत देख, निज को देख तू सुख से विचर॥7॥

 

आकाश घट के बाह्य है, आकाश घट भीतर बसा।

सब विश्व में है पूर्ण तू ही, बाह्य भीतर एक सा॥

श्रृति संत गुरु के वाक्य ये, सच मान रे विश्वास कर।

भोला ! निकल जग-जाल से, निर्बन्ध हो सुख से विचर॥8॥

(3) आश्चर्य है ! आश्चर्य है !!

 

छूता नहीं मैं देह फिर भी, देह तीनों धारता।

रचना करूँ मैं विश्व की, नहीं विश्व से कुछ वासता॥

कर्त्तार हूँ मैं सर्व का, यह सर्व मेरा कार्य है।

फिर भी न मुझमें सर्व है, आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! ॥1॥

 

नहीं ज्ञान ज्ञाता ज्ञेय में से, एक भी है वास्तविक।

मैं एक केवल सत्य हूँ, ज्ञानादि तीनों काल्पनिक॥

अज्ञान से जिस माँहिं भासे, ज्ञान ज्ञाता ज्ञेय हैं।

सो मैं निरंजन देव हूँ, आश्चर्य है ! आश्चर्य  है !! ॥2॥

 

है दुःख सारा द्वैत में, कोई नहीं उसकी दवा।

यह दृश्य सारा है मृषा, फिर द्वैत कैसा वाह वा !!॥

चिन्मात्र हूँ मैं एकरस, मम कल्पना यह दृश्य है।

मैं कल्पना से बाह्य हूँ, आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! ॥3॥

 

नहीं बन्ध है नहीं मोक्ष है, मुझमें न किंचित् भ्रान्ति है।

माया नहीं काया नहीं, परिपूर्ण अक्षय शांति है॥

मम कल्पना है शिष्य, मेरी कल्पना आचार्य है।

साक्षी स्वयं हूँ सिद्ध मैं, आश्चर्य है ! आश्चर्य है !!॥4॥

 

सशरीर सारे विश्व की, किंचित् नहीं सम्भावना।

शुद्धात्म मुझ चिन्मात्र में, बनती नहीं है कल्पना॥

तिहूँकाल तीनों लोक, चौदह भुवन माया-कार्य है।

चिन्मात्र मैं निस्संग हूँ, आश्चर्य है ! आश्चर्य है !!॥5॥

 

रहता जनों में द्वैत का, फिर भी न मुझमें नाम है।

दंगल मुझे जंगल जँचे, फिर प्रीति का क्या काम है॥

'मैं देह हूँ' जो मानता, सो प्रीति करि दुःख पाय है।

चिन्मात्र में भी संग हो, आश्चर्य है ! आश्चर्य !!॥6॥

 

नहीं देह मैं नहीं जीव मैं, चैतन्यघन मैं शुद्ध हूँ।

बन्धन यही मुझ माँहिं था, थी चाह मैं जीता रहूँ॥

ब्रह्माण्डरूपी लहरियाँ, उठ-उठ बिला फिर जाय हैं।

परिपूर्ण मुझ सुखसिंधु में आश्चर्य है ! आश्चर्य !!॥7॥

 

निस्संग मुझ चित्सिन्धु में, जब मन पवन हो जाय लय।

व्यापार लय हो जीव का, जग नाव भी होवे विलय॥

इस भाँति से करके मनन, नर प्राज्ञ चुप हो जाय है।

भोला ! न अब तक चुप हुआ, आश्चर्य है ! आश्चर्य है !!॥8॥

(4) प्राज्ञ-वाणी

 

मैं हूँ निरंजन शांत निर्मल, बोध माया से परे।

हूँ काल का भी काल मैं, मन-बुद्धि-काया से परे॥

मैं तत्त्व अपना भूलकर, व्यामोह में था पड़ गया।

श्रृति संत गुरु ईश्वर-कृपा, सब मुक्त बन्धन से भया॥1॥

 

जैसे प्रकाशूँ देह मैं, त्यों ही प्रकाशूँ विश्व सब।

हूँ इसलिए मैं विश्व सब, अथवा नहीं हूँ विश्व अब॥

सशरीर सारे विश्व का है, त्याग मैंने कर दिया।

सब ठोर मैं ही दीखता हूँ, ब्रह्म केवल नित नया॥2॥

 

जैसे तरंगे तार बुदबुद, सिन्धु से नहीं भिन्न कुछ।

मुझ आत्म से उत्पन्न जग, मुझमें नहीं है अन्य कुछ॥

ज्यों तन्तुओं से भिन्न पट की, है नहीं सत्ता कहीं।

मुझ आत्म से इस विश्व की, त्यों भिन्न सत्ता है नहीं॥3॥

 

ज्यों ईख के रस माँहिं शक्कर, व्याप्त होकर पूर्ण है।

आनन्दघन मुझ आत्म से, सब विश्व त्यों परिपूर्ण है॥

अज्ञान से ज्यों रज्जु अहि हो, ज्ञान से हट जाय है।

अज्ञान निज से जग बना, निज ज्ञान से मिट जाय है॥4॥

 

जब है प्रकाशक तत्त्व मम तो, क्यों न होऊँ प्रकाश मैं।

जब विश्व भर को भासता, तो आप ही हूँ भास मैं॥

ज्यों सीप में चाँदी मृषा, मरुभूमि में पानी यथा।

अज्ञान से कल्पा हुआ, यह विश्व मुझमें है तथा॥5॥

 

ज्यों मृत्तिका से घट बने, फिर मृत्तिका में होय लय।

उठती यथा जल से तरंगे, होय फिर जल में विलय॥

कंकण कटक बनते कनक से, लय कनक में हो यथा।

मुझसे निकलकर विश्व यह, मुझ माँहिं लय होता तथा॥6॥

 

होवे प्रलय इस विश्व का, मुझको न कुछ भी त्रास है।

ब्रह्मादि सबका नाश हो, मेरा न होता नाश है॥

मैं सत्य हूँ मैं ज्ञान हूँ, मैं ब्रह्मदेव अनन्त हूँ।

कैसे भला हो भय मुझे, निर्भय सदा निश्चिंत हूँ॥7॥

 

आश्चर्य है आश्चर्य है, मैं देह वाला हूँ यदपि।

आता न जाता हूँ कहीं, भूमा अचल हूँ मैं तदपि॥

सुन प्राज्ञ वाणी चित्त दे, निजरूप में अब जाग जा।

भोला ! प्रमादी मत बने, भवजेल से उठ भाग जा॥8॥

(5) कैसे भला फिर दीन हो ?

 

ज्यों सीप की चाँदी लुभाती, सीप के जाने बिना।

त्यों ही विषय सुखकर लगे हैं, आत्म पहचाने बिना॥

अज अमर आत्मा जानकर, जो आत्म में तल्लीन हो।

सब रस विरस लगते उसे, कैसे भला फिर दीन हो ?॥1॥

 

सुन्दर परम आनन्दघन, निज आत्म को नहीं जानता।

आसक्त होकर भोग में, सो मूढ हो सुख मानता॥

ज्यों सिंधु में से लहर जिसमें, विश्व उपजे लीन हो।

'मैं हूँ वही' जो मानता, कैसे भला फिर दीन हो ? ॥2॥

 

सब प्राणियों में आपको, सब प्राणियों को आप में।

जो प्रज्ञा मुनि है जानता, कैसे फँसे फिर पाप में॥

अक्षय सुधा के पान में, जिस संत का मन लीन हो।

क्यों कामवश सो हो विकल, कैसे भला फिर दीन हो ? ॥3॥

 

है काम वैरी ज्ञान का, बलवान के बल को हरे ।

नर धीर ऐसा जानकर, क्यों भोग की इच्छा करे ?

जो आज है कल ना रहे, प्रत्येक क्षण ही क्षीण हो ।

ऐसे विनश्वर भोग में, कैसे भला फिर दीन हो ? ॥4॥

 

तत्त्वज्ञ विषय न भोगता, ना खेद मन में मानता।

निज आत्म केवल देखता, सुख दुःख सम है जानता॥

करता हुआ भी नहीं करे, सशरीर भी तनहीन हो।

निंदा-प्रशंसा सम जिसे, कैसे भला फिर दीन हो ? ॥5॥

 

सब विश्व मायामात्र है, ऐसा जिसे विश्वास है।

सो मृत्यु सम्मुख देखकर, लाता न मन में त्रास है॥

नहीं आस जीने की जिसे, और त्रास मरने की न हो।

हो तृप्त अपने आपमें, कैसे भला फिर दीन हो ? ॥6॥

 

नहीं ग्राह्य कुछ नहीं त्याज्य कुछ, अच्छा बुरा नहीं है कहीं।

यह विश्व है सब कल्पना, बनता बिगड़ता कुछ नहीं ॥

ऐसा जिसे निश्चय हुआ, क्यों अन्य के स्वाधीन हो ?

सन्तुष्ट नर निर्द्वन्द्व सो, कैसे भला फिर दीन हो ? ॥7॥

 

श्रुति संत सब ही कर रहे, ब्रह्मादि गुरु सिखला रहे।

श्रीकृष्ण भी बतला रहे, शुक आदि मुनि दिखला रहे॥

सुख सिन्धु अपने पास है, सुख सिन्धु जल की मीन हो।

भोला ! लगा डुबकी सदा, मत हो दुःखी मत दीन हो ॥8॥

(6)  सब हानि-लाभ समान है

 

संसार कल्पित मानता, नहीं भोग में अनुरागता।

सम्पत्ति पा नहीं हर्षता, आपत्ति से नहीं भागता॥

निज आत्म में संतृप्त है, नहीं देह का अभिमान है।

ऐसे विवेकी के लिए, सब हानि-लाभ समान है॥1॥

 

संसारवाही बैल सम, दिन रात बोझा ढोय है।

त्यागी तमाशा देखता, सुख से जगे है सोय है॥

समचित्त है स्थिर बुद्धि, केवल आत्म-अनुसन्धान है।

तत्त्वज्ञ ऐसे धीर को, सब हानि-लाभ समान है॥2॥

 

इन्द्रादि जिस पद के लिए, करते सदा ही चाहना।

उस आत्मपद को पाय के, योगी हुआ निर्वासना॥

है शोक कारण रोग कारण, राग का अज्ञान है।

अज्ञान जब जाता रहा, सब हानि-लाभ समान है॥3॥

 

आकाश से ज्यों धूम का, सम्बन्ध होता है नहीं।

त्यों पुण्य अथवा पाप को, तत्त्वज्ञ छूता है नहीं॥

आकाश सम निर्लेप जो, चैतन्यघन प्रज्ञान है।

ऐसे असंगी प्राज्ञ को, सब हानि-लाभ समान है॥4॥

 

यह विश्व सब है आत्म ही, इस भाँति से जो जानता।

यश वेद उसका गा रहे, प्रारब्धवश वह बर्तता॥

ऐसे विवेकी संत को, न निषेध है न विधान है।

सुख दुःख दोनों एक से, सब हानि-लाभ समान है॥5॥

 

सुर नर असुर पशु आदि जितने, जीव हैं संसार में।

इच्छा अनिच्छा वश हुए, सब लिप्त है व्यवहार में॥

इच्छा अनिच्छा से छुटा, बस एक संत सुजान है।

उस संत निर्मल चित्त को, सब हानि-लाभ समान है॥6॥

 

विश्वेश अद्वय आत्म को, विरला जगत में जानता।

जगदीश को जो जानता, नहीं भय किसी से मानता॥

ब्रह्माण्ड भर को प्यार करता, विश्व जिसका प्राण है।

उस विश्व-प्यारे के लिए, सब हानि-लाभ समान है॥7॥

 

कोई न उसका शत्रु है, कोई न उसका मित्र है।

कल्याण सबका चाहता है, सर्व का सन्मित्र है॥

सब देश उसको एक से, बस्ती भले सुनसान है।

भोला ! उसे फिर भय कहाँ, सब हानि-लाभ समान है॥8॥

 (7)  पुतली नहीं तू मांस की

 

जहाँ विश्व लय हो जाय तहँ, भ्रम भेद सब बह जाय है।

अद्वय स्वयं ही सिद्ध केवल, एक ही रह जाय है॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

नहीं वीर्य तू नहीं रक्त तू, नहीं धौंकनी तू साँस की॥1॥

 

जहाँ हो अहन्ता लीन तहँ, रहता नहीं जीवत्व है।

अक्षय निरामय शुद्ध संवित्, शेष रहता तत्त्व है॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

नहीं जन्म तुझमें नहीं मरण, नहीं पोल है आकाश की॥2॥

 

दिक्काल जहँ नहीं भासते, होता जहाँ नहीं शून्य है।

सच्चित् तथा आनन्द आत्मा, भासता परिपूर्ण है॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

नहीं त्याग तुझमें नहीं ग्रहण, नहीं गाँठ है अभ्यास की॥3॥

 

चेष्टा नहीं जड़ता नहीं, नहीं आवरण नहीं तम जहाँ।

अव्यय अखंडित ज्योति शाश्वत्, जगमगाती सम जहाँ॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

कैसे तुझे फिर बन्ध हो, नहीं मूर्ति तू आभास की॥4॥

 

जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, नहीं व्योम पंचक है जहाँ।

परसे पर ध्रुव शांत शिव ही, नित्य भासे है वहाँ॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

गुण तीन से तू है परे, चिन्ता तुझे क्या नाश की॥5॥

 

जो ज्योतियों की ज्योति है, सबसे प्रथम जो भासता।

अक्षर सनातन दिव्य दीपक, सर्व विश्व प्रकाशता॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

तुझको प्रकाशे कौन तू है, दिव्य मूर्ति प्रकाश की॥6॥

 

शंका जहाँ उठती नहीं, किंचित् जहाँ न विकार है।

आनन्द अक्षय से भरा, नित ही नया भण्डार है॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

फिर शोक तुझमें है कहाँ, तू है अवधि संन्यास की॥7॥

 

जिस तत्त्व को कर प्राप्त परदा, मोह का फट जाय है।

जल जाय हैं सब कर्म, चिज्जड़-ग्रन्थि जड़ कट जाय है॥

सो ब्रह्म है तू है वही, पुतली नहीं तू मांस की।

भोला ! स्वयं हो तृप्ति सुतली, काट दे भवपाश की॥8॥

(8)  सर्वात्म अनुसन्धान कर

 

मायारचित यह देह है, मायारचित ही गेह है।

आसक्ति फाँसी है कड़ी, मजबूत रस्सी स्नेह है॥

भव भेद में है सर्वदा, मत भेद पर तू ध्यान धर।

सर्वत्र आत्मा देख तू, सर्वात्म अनुसंधान कर॥1॥

 

माया महा है मोहनी, बन्धन अमंगल कारिणी।

व्यामोहकारिणी शोकदा, आनन्द मंगल कारिणी॥

माया मरी को मार दे, मत देह में अभिमान कर।

दे भेद मन से मेट सब, सर्वात्म-अनुसंधान कर॥2॥

 

जो ब्रह्म सबमें देखते हैं, ध्यान धरते ब्रह्म का।

भव जाल से हैं छूटते, साक्षात करे हैं ब्रह्म का॥

नर मूढ़ पाता क्लेश है, अपना-पराया मानकर।

ममता-अहंता त्याग दे, सर्वात्म-अनुसंधान कर॥3॥

 

वैरी भयंकर है विषय, कीड़ा न बन तू भोग का।

चंचलता मन का मिटा, अभ्यास करके योग का॥

यह चित्त होता मुक्त है, 'सब ब्रह्म है' यह जानकर।

कर दर्श सबमें ब्रह्म का, सर्वात्म-अनुसंधान कर॥4॥

 

जब नाश होता चित्त का, योगी महा फल पाय है।

जो पूर्ण शशि है शोभता, सब विश्व में भर जाय है॥

चिन्मात्र संवित् शुद्ध जल में, नित्य ही तू स्नान कर।

मन मैल सारा डाल धो, सर्वात्म-अनुसंधान कर॥5॥

 

जो दीखता होता स्मरण, जो कुछ श्रवण में आये है।

मिथ्या नदी मरुभूमि की है, मूढ़ धोखा खाये हैं॥

धोखा न खा सुखपूर्ण आत्मा-सिन्धु का जलपान कर।

प्यासा न मर पीयूष पी, सर्वात्म-अनुसंधान कर॥6॥

 

ममतारहित निर्द्वन्द्व हो, भ्रम-भेद सारे दे हटा।

मत राग कर मत द्वेष कर, सब दोष मन के दे मिटा॥

निर्मूल कर दे वासना, निज आत्म का कल्याण कर।

भाण्डा दुई का फोड़ दे, सर्वात्म-अनुसंधान कर॥7॥

 

देहात्म होती बुद्धि जब, धन मित्र सुत हो जाय हैं।

ब्रह्मात्म होती दृष्टि जब, धन आदि सब खो जाय हैं॥

मल-मूत्र के भण्डार नश्वर, देह को पहचान कर।

भोला ! प्रमादी मत बने, सर्वात्म-अनुसंधान कर॥8॥

(9) बस, आपमें लवलीन हो

 

तू शुद्ध है तेरा किसी से, लेश भी नहीं संग है।

क्या त्यागना तू चाहता ? चिन्मात्र तू निस्संग है॥

निस्संग निज को जान ले, मत हो दुःखी मत दीन हो।

इस देह से तज संग दे, बस आपमें लवलीन हो॥1॥

 

जैसे तरंगे बुलबुले, झागादि बनते सिन्धु से।

त्यों ही चराचर विश्व बनता, एक तुझ चित्सिन्धु से॥

तू सिन्धु सम है एक-सा, नहीं जीर्ण हो न नवीन हो।

अपना पराया भेद तज, बस आपमें लवलीन हो॥2॥

 

अपरोक्ष यद्यपि दीखता, नहीं वस्तुतः संसार है।

तुझ शुद्ध निर्मल तत्त्व में, सम्भव न कुछ व्यापार है॥

ज्यों सर्प रस्सी का बना, फिर रज्जु में ही लीन हो।

सब विश्व लय कर आपमें, बस आपमें लवलीन हो॥3॥

 

सुख-दुःख दोनों जान सम, आशा-निराशा एक सी।

जीवन-मरण भी एक-सा, निंदा-प्रशंसा एक-सी॥

हर हाल में खुशहाल रह, निर्द्वन्द्व चिन्ताहीन हो।

मत ध्यान कर तू अन्य का, बस आपमें लवलीन हो॥4॥

 

भूमा अचल शाश्वत् अमल, सम ठोस है तू सर्वदा।

यह देह है पोला घड़ा, बनता बिगड़ता है सदा॥

निर्लेप रह जल विश्व में, मत विश्व जल की मीन हो।

अनुरक्त मत हो देह में, बस आपमें लवलीन हो॥5॥

 

यह विश्व लहरों के सदृश, तू सिन्धु ज्यों गम्भीर है।

बनते बिगड़ते विश्व हैं, तू निश्चल ही रहे॥

मत विश्व से सम्बन्ध रख, मत भोग के आधीन हो।

नित आत्म-अनुसंधान कर, बस आपमें लवलीन हो॥6॥

 

तू सीप सच्ची वस्तु है, यह विश्व चाँदी है मृषा।

तू वस्तु सच्ची रज्जु है, यह विश्व आहिनी है मृषा॥

इसमें नहीं संदेह कुछ, प्यारे ! न श्रद्धाहीन हो।

विश्वास कर विश्वास कर, बस आपमें लवलीन हो॥7॥

 

सब भूत तेरे माँही हैं, तू सर्व भूतों माँही है।

तू सूत्र सबमें पूर्ण है, तेरे सिवा कुछ नांही है॥

यदि हो न सत्ता एक तो, फिर चर अचर कुछ भी न हो।

भोला ! यही सिद्धान्त है, बस आपमें लवलीन हो॥8॥

(10) छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे ?

 

अक्षुब्ध मुझ अम्बोधि में, ये विश्व नावें चल रहीं।

मन वायु की प्रेरी हुई, मुझ सिन्धु में हलचल नहीं॥

मन वायु से मैं हूँ  परे, हिलता नहीं मन वायु से।

कूटस्थ ध्रुव अक्षोभ है, छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे?॥1॥

 

निस्सीम मुझ सुख-सिन्धु में, जग-वीचियाँ उठती रहें।

बढ़ती रहें घटती रहें, बनती रहें मिटती रहें॥

अव्ययरहित उत्पत्ति से हूँ, वृद्धि से अरु अस्त से।

निश्चल सदा ही एक-सा, छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे ?॥2॥

 

अध्यक्ष हूँ मैं विश्व का, यह विश्व मुझमें कल्पना।

कल्पे हुए से सत्य को, होती कभी कुछ हानि ना॥

अति शांति बिन आकार हूँ, पर रूप से पर नाम से।

अद्वय अनामय तत्त्व मैं, छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे?॥3॥

 

देहादि नहीं है आत्म में, नहीं आत्म है देहादि में।

आत्म निरंजन एक-सा है, अंत में क्या आदि में॥

निस्संग अच्युत निःस्पृही, अति दूर सर्वोपाधि से।

सो आत्म अपना आप है, छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे ?॥4॥

 

चिन्मात्र मैं ही सत्य हूँ, यह विश्व वंध्यापुत्र है।

नहीं बाँझ सुत जनती कभी, सब विश्व कहने मात्र है॥

जब विश्व कुछ है ही नहीं, सम्बन्ध क्या फिर विश्व से।

सम्बन्ध ही जब है नहीं, छोडूँ किसे पकड़ूँ किसे ?॥5॥

 

नहीं देह में नहीं इन्द्रियाँ, मन भी नहीं नहीं प्राण हूँ।

नहीं चित्त हूँ नहीं बुद्धि हूँ, नहीं जीव नहीं विज्ञान हूँ॥

कर्त्ता नहीं भोक्ता नहीं, निर्मुक्त हूँ मैं कर्म से।

निरूपाधि संवित् शुद्ध हूँ, छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे ?॥6॥

 

है देह मुझमें दीखता, पर देह मुझमें है नहीं।

दृष्टा कभी नहीं दृश्य से, परमार्थ से मिलता कहीं॥

नहीं त्याज्य हूँ नहीं ग्राह्य हूँ, पर हूँ ग्रहण से त्याग से।

अक्षर परम आनन्दघन, छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे ?॥7॥

 

अज्ञान में रहते सभी, कर्त्तापना भोक्तापना।

चिद्रूप मुझमें लेश भी, सम्भव नहीं है कल्पना॥

यों स्वात्म-अनुसंधान कर, छुटे चतुर भवबन्ध से।

भोला ! न अब संकोच कर, छोड़ूँ किसे पकड़ूँ किसे ?॥8॥

(11)  बन्धन यही कहलाय है ?

 

मैं तू नहीं पहचानना, विषयी विषय नहीं जानना।

आत्मा अनात्मा मानना, निज अन्य नहीं पहिचानना॥

चेतन अचेतन जानना, अति पाप माना जाय है।

सन्ताप यह भी देह है, बन्धन यही कहलाये है॥1॥

 

क्या ईश है? क्या जीव है? यह विश्व कैसे बन गया?

पावन परम निस्संग आत्मा, संग में क्यों सन गया?

सुख-सिन्धु आत्मा एकरस, सो दुःख कैसे पाय है?

कारण न इसका जानना, बन्धन यही कहलाय है॥2॥

 

इस देह को 'मैं' मानना, या इन्द्रियाँ 'मैं' जानना।

अभिमान करना चित्त में, या बुद्धि 'मैं' पहचानना॥

देहादि के अभिमान से, नर मूढ़ दुःख उठाये हैं।

बहु योनियों में जन्मता, बन्धन यही कहलाये हैं॥3॥

 

बड़ी कठिन है कामना, आसक्ति दृढ़तम जाल है।

ममता भयंकर राक्षसी, संकल्प काल ब्याल है॥

इन शत्रुओं के वश हुआ, जन्मे-मरे पछताये है।

सुख से कभी सोता नहीं, बन्धन यही कहलाये है॥4॥

 

यह है भला यह है बुरा, यह पुण्य है यह पाप है।

यह लाभ है यह हानि है, यह शीत है यह ताप है॥

यह ग्राह्य है यह त्याज्य है, यह आय है यह जाय है।

इस भाँति मन की कल्पना, बन्धन यही कहलाये है॥5॥

 

श्रोत्रादि को 'मैं' मान नर, शब्दादि में फँस जाय है।

अनुकूल में सुख मानता, प्रतिकूल से दुःख पाये हैं॥

पाकर विषय है हर्षता, नहीं पाय तब घबराये है।

आसक्त होना भोग में, बन्धन यही कहलाये है॥6॥

 

सत्संग में जाता नहीं, नहीं वेद आज्ञा मानता।

सुनता न हित उपदेश, अपनी तान उलटी तानता॥

शिष्टाचरण करता नहीं, दुष्टाचरण ही भाये है।

कहते इसे हैं मूढ़ता, बन्धन यही कहलाये है॥7॥

 

यह चित्त जब तक चाहता, या विश्व में है दौड़ता।

करता किसी को है ग्रहण, अथवा किसी को छोड़ता॥

सुख पाय के है हर्षता, दुःख देखकर सकुचाये है।

भोला ! न तब तक मोक्ष हो, बन्धन यही कहलाये है॥8॥

(12)  इच्छा बिना ही मुक्त है

 

ममता नहीं सुत दार में, नहीं देह में अभिमान है।

निन्दा प्रशंसा एक-सी, सम मान अरु अपमान है॥

जो भोग आते भोगता, होता न विषयासक्त है।

निर्वासना निर्द्वन्द्व सो, इच्छा बिना ही मुक्त है॥1॥

 

सब विश्व अपना जानता, या कुछ न अपना मानता।

क्या मित्र हो क्या शत्रु, सबको एक सम सम्मानता है॥

सब विश्व का है भक्त जो, सब विश्व जिसका भक्त है।

निर्हेतु सबका सुहृद सो, इच्छा बिना ही मुक्त है॥2॥

 

रहता सभी के संग पर, करता न किंचित संग है।

है रंग पक्के में रँगा, चढ़ता न कच्चा रंग है॥

है आपमें संलग्न, अपने आप में अनुरक्त है।

है आपमें संतुष्ट सो, इच्छा बिना ही मुक्त है॥3॥

 

सुन्दर कथायें जानता, देता घने दृष्टान्त है।

देता दिखाई भ्रांत-सा, भीतर परम ही शांत है॥

नहीं राग है नहीं द्वेष है, सब दोष है निर्मुक्त है।

करता सभी को प्यार सो, इच्छा बिना ही मुक्त है॥4॥

 

नहीं दुःख से घबराय है, सुख की जिसे नहीं चाह है।

सन्मार्ग में विचरे सदा, चलता न खोटी राह है॥

पावन परम अन्तःकरण, गम्भीर धीर विरक्त है।

शम दम क्षमा से युक्त हो, इच्छा बिना ही मुक्त है॥5॥

 

जीवन जिसे रुचता नहीं, नहीं मृत्यु से घबराय है।

जीवन मरण है कल्पना, अपना न कुछ भी जाय है॥

अक्षय अजर शाश्वत अमर, निज आत्म में संतृप्त है।

ऐसा विवेकी प्राज्ञ नर, इच्छा बिना ही मुक्त है॥6॥

 

माया नहीं काया नहीं, वन्ध्या रचा यह विश्व है।

नहीं नाम ही नहीं रूप ही, केवल निरामय तत्त्व है॥

यह ईश है यह जीव माया, माँही सब संक्लृप्त है।

ऐसा जिसे निश्चय हुआ, इच्छा बिना ही मुक्त है॥7॥

 

कर्तव्य था सो कर लिया, करना न कुछ भी शेष है।

था प्राप्त करना पा लिया, पाना न अब कुछ लेश है॥

जो जानता था जानकर, स्व-स्वरूप में संयुक्त है।

भोला ! नहीं संदेह सो, इच्छा बिना ही मुक्त है॥8॥

(13)  ममता अहंता छोड़ दे

पूरे जगत के कार्य कोई, भी कभी नहीं कर सका।

शीतोष्ण से सुख-दुःख से, कोई भला क्या तर सका?

निस्संग हो निश्चिन्त हो, नाता सभी से तोड़ दे।

करता भले रह देह से, ममता अहंता छोड़ दे॥1॥

 

संसारियों की दुर्दशा को, देख मन में शांत हो।

मत आश का हो दास तू, मत भोगसुख में भ्रांत हो॥

निज आत्म सच्चा जानकर, भाण्डा जगत का फोड़ दे।

अपना पराया मान मत, ममता अहंता छोड़ दे॥2॥

 

नश्वर अशुचि यह देह, तीनों ताप से संयुक्त हो।

आसक्त हड्डी मांस पर, होना तुझे नहीं युक्त हो॥

पावन परम निज आत्म में, मन वृत्ति अपनी जोड़ दे।

संतोष समता कर ग्रहण, ममता अहंता छोड़ दे॥3॥

 

है काल ऐसा कौन-सा, जिसमें न कोई द्वन्द्व है।

बचपन तरुणपन वृद्धपन, कोई नहीं निर्द्वन्द्व है॥

कर पीठे पीछे द्वन्द्व सब, मुख आत्म की दिशि मोड़ दे।

कैवल्य निश्चय पायेगा, ममता अहंता छोड़ दे॥4॥

 

योगी महर्षि साधुओं की, हैं  घनी पगडण्डियाँ।

कोई सिखाते सिद्धियाँ, कोई बताते रिद्धियाँ॥

ऊँचा न चढ़ नीचा न गिर, तज धूप दे तज दौड़ दे।

सम शांत हो जा एकरस, ममता अहंता छोड़ दे॥5॥

 

सुखरूप सच्चित् ब्रह्म को, जो आत्म अपना जानता।

इन्द्रादि सुर के भोग सारे, ही मृषा है मानता॥

दस सौ हजारों शून्य मिथ्या, छोड़ लाख करोड़ दे।

एक आत्म सच्चा ले पकड़, ममता अहंता छोड़ दे॥6॥

 

गुण तीन पाँचों भूत का, यह विश्व सब विस्तार है।

गुण भूत जड़ निस्सार सब, तू एक दृष्टा सार है॥

चैतन्य की कर होड़ प्यारे ! त्याग जड़ की होड़ दे।

तू शुद्ध है तू बुद्ध है, ममता अहंता छोड़ दे॥7॥

 

शुभ होय अथवा हो अशुभ, सब वासनाएँ छाँट दे।

निर्मूल करके वासना, अध्यास की जड़ काट दे॥

अध्यास खुजली कोढ़ है, कोढ़ी न बन तज कोढ़ दे।

सुख शांति भोला ! ले पकड़, ममता अहंता छोड़ दे॥8॥