Sant Shri Asharamji Bapu

Sant Shri Asharamji Bapu is a Self-Realized Saint from India, who preaches the existence of One Supreme Conscious in every human being.

Search This Blog

संत श्री आशारामजी बापू

भारत के संत श्री आशारामजी बापू आत्मज्ञानी संत हैं, जो मानवमात्र मे एक सच्चिदानंद इश्वर के अस्तित्व का उपदेश देते है

आत्मगुंजन

 ॥ आत्म गुंजन ॥


मानव ! तुझे नहीं याद क्या ? तू ब्रह्म का ही अंश है।


कुल गोत्र तेरा ब्रह्म है, सद्ब्रह्म तेरा वंश है॥


चैतन्य है तू अज अमल है, सहज ही सुख राशि है।


जन्मे नहीं,मरता नहीं, कूटस्थ है अविनाशी है ॥१॥


 


निर्दोष है निस्संग है बेरुप है बिनु रंग है।


तीनों शरीरों से रहित, साक्षी सदा बिनु अंग है॥


सुख शांति का भण्डार है, आत्मा परम आनन्द है।


क्यों भूलता है आपको ? तुझ में न कोई द्वन्द्व है ॥२॥


 


क्यों दीन है तू हो रहा ? क्यों हो रहा मन खिन्न है।


क्यो हो रहा भयभीत, तू तो एक तत्व अभिन्न है॥


कारण नहीं है शोक का, तू शुद्ध बुद्ध अजन्य है।


क्या काम है अब मोह का तू एक आत्म अनन्य है ॥३॥


 


तू रो रहा है किसलिये ?आँसू बहाना छोड़ दे।


चिन्ता चिता में मत जले, मन का जलाना छोड़ दे॥


आलस्य में पड़ना तुझे, प्यारे ! नहीं है सोहता।


अज्ञान है अच्छा नहीं, क्यों व्यर्थ है तू मोहता ॥४॥


 


तू आप अपनी याद कर, फिर आत्म को तू प्राप्त हो।


ना जन्म ले मर भी नहीं, मत ताप से संतृप्त हो॥


जो आत्म सो परमात्म है, तू आत्म में संतृप्त हो।


यह मुख्य तेरा काम है, मत देह में संतृप्त हो ॥५॥


 


तू अज अजर है अमर है, परिणाम तुझमें है नहीं।


सच्चित् तथा आनन्दधन, आता न जाता है कहीं॥


प्रज्ञान शाश्वत मुक्त तुझमें रुप है नहीं नाम है।


कूटस्थ भूमा नित्य पूरण, काम है निष्काम है ॥६॥


 


माया रची तू आप ही है, आप ही तू फँस गया।


कैसा महा आश्चर्य है ? तू भूल अपने को गया॥


संसार-सागर डूब कर, गोते पड़ा है खा रहा।


अज्ञान से भव सिन्धु में, बहता चला है जा रहा ॥७॥


 


है सर्व व्यापक आत्म तू, सब विश्व में है भर रहा।


छोटा अविद्या से बना है, जन्म ले ले मर रहा ॥


माने स्वयं को देह तू, ममता अहंता कर रहा ।


चिंता करे है दूसरों की, व्यर्थ ही है जर रहा ॥८॥


 


कर्ता बना भोक्ता बना, ज्ञाता प्रमाता बन गया।


दलदल शुभाशुभ कर्म में, निस्संग भी तू सन गया॥


करता किसीसे राग है, माने किसीसे द्वेष है।


इच्छा करे मारा फिरे तू, देश और विदेश है ॥९॥


 


हैं डाल लीन्हीं पैर में, जंजीर लाखों कामना।


रोवे तथा चिल्लाय है, जब कष्ट का हो सामना॥


धन चाहता सुत दार नाना, भोग है तू चाहता।


अन्धे कुँऐ में कर्म के गिर कष्ट अनेकों पावता ॥१०॥


 


माया नटी के जाल में, फँस हो गया कंगाल तू।


दर-दर फिरे है भटकता, जग सेठ मालामाल तू॥


तू कर्म बेड़ी में बँधा, जन्मे पुनः मर जाय है।


ऊँचा चढ़े है स्वर्ग में, फिर नरक में गिर जाय है ॥११॥


 


मजबूत अपने जाल में, माया तुझे है बाँधती।


दे जन्म तुझको मारती, गर्भाग्नि में फिर राँधती॥


चिंता क्षुधा भय शोकमय, रातें तुझे दिखलावती।


भव के भयानक मार्ग में,बहु भाँति है भटकावती ॥१२॥


 


संसार दल दल माँहि है, माया तुझे धसकावती।


तू जानता ऊँचा चढ़ूँ, नीचे लिये है जावती॥


ज्ञानाग्नि होली बाल के, माया जली को दे जला।


ज्ञानाग्नि से जाले बिना, टलनी नहीं है यहाँ बला ॥१३॥


 


जब चित्त पूर्ण निरुद्ध हो, तब तू समाधि पायेगा।


जब तक न होगा चित्त स्थिर, नहीं मोह तब तक जायेगा॥


जब मोह होगा दूर तब, तू आत्म को लख पायेगा।


जब होय दर्शन आत्म का, कृतकृत्य तू हो जायेगा ॥१४॥


 


मन कर्म वाणी से तथा, जो शुद्ध पावन होय है।


अधिकारी सो ही योग का है ज्ञान पाता सोय है।


हो तू सदाचारी सदा, मन इन्द्रियों को जीत रे।


ना स्वप्न में भी दूसरों की, तू बुराई चीत रे ॥१५॥


 


क्या क्या करुँ, कैसे करुँ, यह जानना यदि इष्ट है।


तो शास्त्र संत बतायेंगे, जो इष्ट या कि अनिष्ट है॥


श्रद्धा सहित जा शरण उनकी, त्याग निज अभिमान दे।


निर्दम्भ हो, निष्कपट हो, श्रुति संत को सन्मान दे ॥१६॥


 


मैं और मेरा त्याग दे, मत लेश भी अभिमान कर।


सबका नियंता मानकर, विश्वेश का ही ध्यान कर॥


मत मान कर्ता आपको, कर्तार भगवत जान रे।


तो स्वर्ग द्वारा जाय खुल, तेरे लिये सच मान रे ॥१७॥


 


निश दिन निरन्तर बरसती, सुख मेघ की शीतल झड़ी।


भीतर न तेरे जा सके, है आड़ ममता की पड़ी॥


ममता अहंता त्याग दे, वर्षा सुधा की आयेगी।


ईर्ष्या-जलन बुझ जायेगी, चिंता तपन मिट जायेगी ॥१८॥


 


ममता अहंता वायु का, झोंका न जब तक जायेगा।


विज्ञान दीपक चित्त में, तेरे नहीं जुड़ पायेगा॥


श्रुति संत का उपदेश तब तक, बुद्धि में नहीं आयेगा।


नहीं शान्ति होगी लेश भी, नहीं तत्त्व समझा जायेगा ॥१९॥


 


सिद्धान्त सच्चा है यही, जगदीश ही कर्तार है।


सबका नियन्ता है वही, ब्रह्माण्ड का आधार है।


विश्वेश की मर्जी बिना, नहीं कार्य कोई चल सके।


ना सूर्य ही है तप सके, नहीं चन्द्र ही है हल सके ॥२०॥


 


कुछ भी नहीं मैं कर सकूँ, करता सभी विश्वेश है।


ऐसी समझ उत्तम महा, सच्चा यही आदेश है॥


पूरा करुँगा कार्य यह, वह कार्य मैंने है करा।


पूरा यही अज्ञान है अभिमान यह ही है खरा ॥२१॥


 


मैं क्षुद्र है, मेरा बुरा, मुझ भी मृषा है त्याग रे।


अपना पराया कुछ नहीं, अभिमान से हट भाग रे॥


यह मार्ग है कल्याण का, हो जाय तू निष्पाप रे।


देहादि मैं मत मान रे, सोहं किया कर जाप रे ॥२२॥


 


यदि शांति अविचल चाहता यदि इष्ट निज कल्याण है।


संशय रहित सच जान तेरा,शत्रु यह अभिमान है॥


मत देह में अभिमान कर, कुल आदि का तज मान दे।


नहीं देह मैं, नहीं देह मेरा, नित्य इस पर ध्यान दे ॥२३॥


 


है दर्प काला सर्प सिर, उसका कुचल दे मार दे।


ले जीत रिपु अभिमान को, निज देह में से टार दे॥


जो श्रेष्ठ माने आपको, सो मूढ़ चोटें खाय है।


तू श्रेष्ठ सबसे है नहीं, क्यों श्रेष्ठता दिखलाय है ॥२४॥


 


मत तू प्रतिष्ठा चाह रे, मत तू प्रशंसा चाह रे।


सबको प्रतिष्ठा दे, प्रतिष्ठित आप तू हो जाय रे॥


वाणी तथा आचार में, माधुर्यता दिखला सदा।


विद्या विनय से युक्त होकर,सौम्यता सिखला सदा ॥२५॥


 


कर प्रीति शिष्टाचार में, वाणी मधुर उच्चार रे।


मन बुद्धि को पावन बना, संसार से हो पार रे॥


प्यारा सभी को हो सदा, कर तू सभी को प्यार रे।


निःस्वार्थ हो निष्काम हो, जग जान तू निःसार रे ॥२६॥


 


छोटे बड़े निर्धन धनी, कर प्यार सबको एक सम।


बट्टे सभी शिल एक के, कोई नहीं है वेश कम॥


मत तू किसी से कर घृणा, सबकी भलाई चाह रे।


जब मार्ग में काँटे धरे, बो फुल उसकी राह रे ॥२७॥


 


हंसा किसीकी कर नहीं, जो बन सके उपकार कर।


विश्वेश को यदि चाहता है, विश्वभर को प्यार कर॥


जो मृत्यु भी आ जाय तो, उसकी न तू परवाह कर।


मत दूसरे को भय दिखा, रह आप भी सबसे निडर ॥२८॥


 


निःस्वार्थ सेवी हो सदा, मन मलिन होता स्वार्थ से।


जब तक रहेगा मन मलिन, नहीं भेंट हो परमार्थ से॥


जे शुद्ध मन नर होय हैं, वे ईश दर्शन पायँ हैं।


मन के मलिन नहीं स्वप्न में भी, ईश सन्मुख जायँ है ॥२९॥


 


पीड़ा न दे तू हाथ से, कड़वा वचन मत बोल रे।


संकल्प मत कर अशुभ तू, सच बोल पूरा तोल रे॥


ऎसी किया कर भावना, नहीं दूर तुझसे लेश है।


रहता सदा तेरे निकट, पावन परम विश्वेश है ॥३०॥


 


तू शुद्ध से भी शुद्ध अति, जगदीश का नित ध्यान धर।


हो आप भी जा शुद्ध तू, मैला न अपना चित्त कर॥


हो चित्त तेरा खिन्न, ऐसा शब्द तू मत सुन कभी।


मत देख ऐसा दृश्य ही, मत सोच ऐसी बात भी ॥३१॥


 


जो नारी नर भगवद्विमुख, संसार में आसक्त हैं।


विपरीत करते आचरण, निज स्वार्थ में अनुरक्त हैं॥


कंजूस कामी क्रूर जे, परदार-रत परधन हरे।


मत पास उनके जा कभी, जे अन्य की निन्दा करे ॥३२॥


 


रह दूर हर दम पाप से, निष्पाप हो निष्काम हो ।


निर्दोष पातक से रहित, निःसंग आत्माराम हो॥


भगवत् परम निष्पाप हैं, तू पाप अपने धोय रे।


भगवत् तुरत ही दर्श दें, अघहीन यदि तू होय रे ॥३३॥


 


जे लोक की परलोक की, नहीं कामनायें त्यागते।


संसार के हैं श्वान जे, संसार में अनुरागते॥


कंचन जिन्हें प्यारा लगे, जे मूढ किंकर काम के।


नहीं शांति वे पाते कभी, नहीं भक्त होते राम के ॥३४॥


 


रह लोभ से अति दूर ही, जा दर्प के तू पास ना।


बच काम से अरु क्रोध से, कर गर्व से सहवास ना॥


आलस्य मत कर भूल भी, ईर्ष्या न कर मत्सर न कर ।


हैं आठ ये वैरी प्रबल, इन वैरियों से भाग डर ॥३५॥


 


विश्व से कर मित्रता, श्रद्धा सहेली ले बना ।


प्रज्ञा तितिक्षा को बढ़ा, प्रिय न्याय का कर त्याग ना॥


गम्भीरता शुभ भावना, अरु धैर्य का सम्मान कर ।


हैं आठ सच्चे मित्र ये, कल्याण कर भव-भीर हर ॥३६॥


 


शिष्टाचरण की ले शरण, आचार दुर्जन त्याग दे ।


मन इन्द्रियाँ स्वाधीन कर, तज द्वेष दे तज राग दे॥


सुख शांति का यह मार्ग है, श्रुति संत कहते हैं सभी।


दुर्जन दुराचारी नहीं, पाते अमर पद हैं कभी ॥३७॥


 


अभ्यास ऐसा कर सदा, पावन परम हो जाय रे।


कर सत्य पालन नित्य ही, नहीं झूठ मन में आय रे॥


झूठे सदा रहते फँसे, माया नटीके जाल में।


तू सत्य भूमा प्राप्त कर, मत काल के आ गाल में ॥३८॥


 


है सत्य भूमा एक ही, मिथ्या सभी संसार रे।


तल्लीन भूमा माँही हो, कर तात ! निज उद्धार रे॥


कर निज मुख्य कर्तव्य तू, स्वराज्य भूमा प्राप्त कर।


मत यक्ष राक्षस पूजने में, दिव्य देह समाप्त कर ॥३९॥


 


सच जान जे हैं आलसी, निज हानि करते हैं सदा।


करते उन्हों का संग जे, वे भी दुःखी हों सर्वदा॥


आलस्य को दे त्याग तू, मन कर्म शिष्टाचार कर।


अभ्यास कर वैराग्य कर, निज आत्म का उद्धार कर ॥४०॥


 


हो उद्यमी संतुष्ट तू, गम्भीर धीर उदार हो।


धारण क्षमा उत्साह कर, शुभ गुणन का भंडार हो॥


कर कार्य सर्व विचार से, समझे बिना मत कार्य कर।


शम दम यमादिक पाल तू, तप कर तथा स्वाध्याय कर ॥४१॥


 


जो धैर्य नहीं हैं धारते, भय देख घबरा जाय हैं।


सब कार्य उनका व्यर्थ है, नहीं सिद्धि वे नर पाय हैं॥


चिंता कभी मिटती नहीं, नहीं दुःख उनका जाय है।


पाते नहीं सुख लेश भी, नहीं शांति मुख दिखलाय है ॥४२॥


 


गर्मी न थोड़ी सह सके, सर्दी सही नहीं जाय है।


नहीं सह सके हैं शब्द इक,चढ़ क्रोध उन पर आय है॥


जिसमें नहीं होती क्षमा, नहीं शांति सो नर पाय है।


शुचि शांत मन संतुष्ट हो,सो नर सुखी हो जाय है ॥४३॥


 


मर्जी करेगा दूसरों की, सुख नहीं तू पायेगा।


नहीं चित्त होगा थिर कभी, विक्षिप्त तू हो जायगा॥


संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ।


कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ ॥४४॥


 


सम्बंध लाखों व्यक्तियों से, यदि करेगा तू सदा।


तो कार्य लाखों भाँति के, करता रहेगा सर्वदा ॥


कैसे भला फिर चित्त तेरा, शांत निर्मल होयेगा।


लाखों जिसे बिच्छु डसें कैसे बता सो सोयगा ॥४५॥


 


तू न्यायकारी हो सदा, समबुद्धि निश्चल चित्त हो।


चिंता किसी की मत करे, निर्द्वन्द्व हो मन शांत हो॥


प्रारब्ध पर दे छोड़ सब, जग ईश में अनुरक्त हो।


चिंतन उसीका कर सदा, मत जगत में आसक्त ॥४६॥


 


कर्ता वही धरता वही, सब में वही सब है वही।


सर्वत्र उसको देख तू, उपदेश सच्चा है यही॥


अपना भला ज्यों चाहता, त्यों चाह तू सबका भला।


संतुष्ट पूरा शांत हो, चिंता बुरी काली बला ॥४७॥


 


हे पुत्र ! थोड़ा वेग भी, यदि दुःख का न उठा सके।


तो शांति अविचल तत्व की, कैसे भला तू पा सके॥


हो मृत्यु का जब सामना, तब दुःख होवेगा घना।


कैसे सहेगा दुःख सो, यदि धैर्य तुझमें होय ना ॥४८॥


 


कर तू तितिक्षा रात दिन, जो दुःख आवे झेल ले।


वह ही अमर पद पाय है जो कष्ट से नहीं है हले ॥


है दुःख ही सन्मित्र, सब कुछ दुःख ही सिखलाय है।


बल बुद्धि देता दुःख, पण्डित धीर वीर बनाय है ॥४९॥


 


बल बुद्धि तेरी की परीक्षा, दुःख आकर लेय है।


जो पाप पहिले जन्म के हैं, दूर सब कर देय है॥


निर्दोष तुझको देय कर, पावन बनाता है तुझे।


क्या सत्य और असत्य क्या यह भी सिखाता है तुझे ॥५०॥


 


तू कष्ट से घबरा न जा रे, कष्ट ही सुख मान रे।


जो कार्य नहीं हो सिद्ध तो भी, लाभ उसमें जान रे॥


बहुबार पटके खाय है, तब मल्ल मल्लन पीटता।


लड़ता रहे जो धैर्य से, माया-किला सो जीतता ॥५१॥


 


यदि कष्ट से घबराय के, तू युद्ध से हट जायेगा।


तो तू जहाँ पर जायगा, बहु भाँति कष्ट उठायेगा॥


जन्मे कहीं भी जाय के, नहीं मुक्त होगा युद्ध से।


रह युद्ध करता धैर्य से, जब तक मिले नहीं शुद्ध से ॥५२॥


 


इसमें नहीं सन्देह, जीवन झंझटों से युक्त है।


वह ही यहाँ जय पाय है, जो धैर्य से संयुक्त है॥


समता क्षमा से युक्त ही, मन शांत रहता है यहाँ।


जो कष्ट सह सकता नहीं, सुख शांति उसको है कहाँ ॥५३॥


 


जो जो करे तू कार्य कर, सब शांत होकर धैर्य से।


उत्साह से अनुराग से, मन शुद्ध से बल वीर्य से॥


जो कार्य हो जिस काल का, कर तू समय पर ही उसे।


दे मत बिगड़ने कार्य कोई, मूर्खता आलस्य से ॥५४॥


 


दे ध्यान पूरा कार्य में, मत दूसरे में ध्यान दे।


कर तू नियम से कार्य सब, खाली समय मत जान दे॥


सब धर्म अपने पूर्ण कर, छोटे बड़े से या बड़े।


मत सत्य से तू डिग कभी, आपत्ति कैसी ही पड़े ॥५५॥


 


निःस्वार्थ होकर कार्य कर, बदला कभी मत चाह रे।


अभिमान मत कर लेश भी, मत कष्ट की परवाह रे॥


क्या खान हो क्या पान हो क्या पुण्य हो क्या दान हो।


सब कार्य भगवत हेतु हों क्या होय जप क्या ध्यान हो॥५६॥


 


कुछ भी न कर अपने लिये, कर कार्य सब शिव के लिये।


पूजा करें या पाठ कर, सब प्रेम भगवत् के लिये॥


सब कुछ उसीको सौंप दे, निशिदिन उसीको प्यार कर।


सेवा उसीकी कर सदा, दूजा न कुछ व्यापार कर ॥५७॥


 


सदग्रंथ पढ़ तू भक्ति शिक्षक, ज्ञानवर्धक शास्त्र पढ़।


विद्या सभी पढ़ श्रेयकारिणि, मोक्षदायक शास्त्र पढ़॥


आदर सहित अनुराग से, सदग्रंथ का ही पाठ कर।


दे चित्त शिष्टाचार में, दुष्टाचरण पर लात धर ॥५८॥


 


पढ़ ग्रंथ नित्य विवेक के, मन स्वच्छ तेरा होयगा।


वैराग्य के पढ़ ग्रंथ तू, बहुजन्म के अघ धोयगा॥


पढ़ ग्रंथ सादर भक्ति से, आहूलाद मन भर जायेगा।


श्रद्धा सहित स्वध्याय कर, संसार से तर जायेगा ॥५९॥


 


जो जो पढ़े सब याद रख, दिनरात नित्य विचार कर।


श्रुतियाँ भले स्मृतियाँ, पुराणादिन सभी निर्धार कर॥


अभ्यास से सत् शास्त्र के, जब बुद्धि तीव्र बनायगा।


तो तीव्र प्रज्ञा की मदद से, तत्व तू लख पायगा॥६०॥


 


जे नर दुराचारी तथा, निज स्वार्थ में रत होय है।


गिर कूप में वे मोह के, सुख शांति से नहीं सोय हैं॥


भटका करें ब्रह्माण्ड में, बहु भाँति कष्ट उठावते।


मतिमन्द श्रुति के अर्थ को, सम्यक् समझ नहीं पावते ॥६१॥


 


मत मोह में तू फँस कभी, निर्मुक्त हो संमोह से।


कर बुद्धि निर्मल स्वच्छ, रह तू दूर दुःखकर द्रोह से ॥


जब चित्त होगा स्वच्छ, तबही शांति अक्षय पायगा।


जो जो पढ़ेगा शास्त्र तू, सम्यक् समझ में आयगा ॥६२॥


 


गुरु वाक्य का कर अनुसरण, विश्वास श्रद्धायुक्त हो।


बतलाय है जो शास्त्र कर आचार संशय मुक्त हो॥


जो जो बताते शास्त्र गुरु, उपदेश सर्व यथार्थ है।


संशय न उसमें कर कभी, यदि चाहता परमार्थ है ॥६३॥


 


यह ज्ञान ही केवल तुझे, सुख मुक्ति का दातार है।


ना ज्ञान बिन सौ कल्प में भी छुटता संसार है॥


सब वृत्तियों को रोककर, तू चित्त को एकाग्र कर।


कर शांत सारी वृत्तियाँ, निज आत्म का नित ध्यान कर ॥६४॥


॥ ॐ ॥


Audio

श्री गुरू अष्टकम

 शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं,

यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम् |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||१||


 कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं,

गृहो बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम् |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||२||


षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या,

कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||३||


विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः,

सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||४||


क्षमामण्डले भूपभूपलबृब्दैः,

सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम् |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||५||


यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्,

जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात् |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||६||


न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ,

न कन्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||७||


अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये,

न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये |

मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||८||


गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेही,

यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही |

लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञं,

गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ||९||


श्रीमद आद्य शंकराचार्यविरचितम

Audio

आनंद मंगल करूँ आरती

 आनंद मंगल करूँ आरती

हरि गुरु संत नी सेवा


प्रेम धरि ने म्हारे मंदिर पधारो

सुन्दर सुखड़ा लेवा

आनंद मंगल करूँ आरती

हरि गुरु संत नी सेवा


जेणे आँगण तुलसी नो क्यारो

शालीग्राम नी सेवा

आनंद मंगल करूँ आरती

हरि गुरु संत नी सेवा


अडसठ तीरथ संतो ना चरणे

गंगा यमुना रेवा

आनंद मंगल करूँ आरती

हरि गुरु संत नी सेवा


संत मळे तो महासुख पाऊँ

गुरूजी मळे तो मेवा

आनंद मंगल करूँ आरती

हरि गुरु संत नी सेवा



कहे प्रीतम जेने हरि छे व्हाला

हरि ना जन हरि जेवा 

आनंद मंगल करूँ आरती

हरि गुरु संत नी सेवा


Audio 1

Audio 2

Audio 3

Audio 4


जयदेव जयदेव जय सद्गुरू राया

 जयदेव जयदेव जय सदगुरू राया

आरती ओवाळीता हरली भवमाया


गुरू मंत्राची दीक्षा देऊनी

षड़रिपुंचा अंत केलासे मनी

उद्धरिले साधक गेले तरुनी

अर्पण पुष्पांजली बापूं च्या चरणी

जयदेव जयदेव जय सदगुरू राया


सदैव प्रसन्नते ची शिक्षा देऊनी

नवचैतन्य आले अमुच्या जीवनी

ऊर्ध्व गामी नेले गुरूदेवांनी

अर्पण पुष्पांजली बापूं च्या चरणी

जयदेव जयदेव जय सदगुरू राया


अत्मज्ञाना ची शिकवण देऊनी

हरि ॐ हरि ॐ मंत्र गाऊनी

पूर्ण केली इच्छा सद्गुरू देवां नी

ठेविता माथा सद्गुरू चरणी 

जयदेव जयदेव जय सदगुरू राया


Audio

पादुका आरती

 शुभ मंगल का आशीष पाओ

गुरु चरणन की आरती गाओ


 गुरु के चरण हैं निर्मल निर्मल

दर्शन से हम होते पावन

चरणन रज निज शीश लगाओ


 तीथो का है वास इन्हीं में

चरणामृत से भाग्य बनाओ


 गंगाजल से चरण पखारो

फिर चंदन का तिलक लगाओ 

सुमन माला से इन्हें सजाओ


जब भी कोई भय आ जाय

और चिंता का रोग सताये

निर्भय होकर बढते जाओ


गुरुचरणों को जो निशदिन ध्यावे

सुखशांति और वैभव पावे

मिलकर सब जयकारा लगाओ


पादुका भजन

  प्यारी हमारी गुरुपादुका

 ज्योत जगानेवाली है

इन चरणों की बडी मिहमा है

 इनकी शान निराली है

प्यारी हमारी गुरुपादुका...


इन चरणों में निष्ठा करके

 महाखजाना पाया है

भरत लखन हनुमत जीवन ने 

यही संदेश सुनाया है

प्यारी हमारी गुरुपादुका...


वेद भी मिहमा गा न सके

 पूरा सद्गुरु चरणों की

सरस्वती भी लिख न सके है

ऐसी छटा इन चरणों की

प्यारी हमारी गुरुपादुका...


 शिक्त, भिक्त मिक्त देते हैं

गुरुवर के चरणकमल

भवसागर से पार कराते हैं

ये पावन चरण कमल

प्यारी हमारी गुरुपादुका...


श्रीविसष्ठ को दशरथ नंदन राम ने

गुरु बनाया था

ऋिष सांदीपिन के चरणों में 

कृष्ण ने खुद को चढाया था

प्यारी हमारी गुरुपादुका...


ब्रह्मा, विष्णु, सदािशव ये सब

 गुरुतत्त्व के रूप हैं

इसिलए तो गुरुचरणों की मिहमा

 अमित अनूप है

प्यारी हमारी गुरुपादुका...

Audio



जय सद्गुरु स्वामी

 जय सद्गुरु स्वामी !ॐजय सद्गुरु स्वामी

अधमोद्धारण प्रभुजी, नमीए शीश नामी

ॐजय सद्गुरु स्वामी...


अलख निरंजन आप ,छो तमे अविनाशी

शुद्ध स्वयंप्रकाशी, सहुना सुखराशि

ॐजय सद्गुरु स्वामी...


सिच्चदानद स्वरूप , शब्दतीत स्वामी

शब्दसुधारससधु, अविचल पदधामी

ॐजय सद्गुरु स्वामी...


राम रूपे रमी रहया छो, सर्व महीं व्यापी

अनुपम रूप तमारु, कोण शके पामी

ॐजय सद्गुरु स्वामी...


भवसागर मां बूडता, जीव तारी लीधा

तत्त्वमिस समजावी, आप स्वरूप कीधा

ॐजय सद्गुरु स्वामी...


शंकर शुद्ध स्वरूप, हे करुणाकारी

सकण जगतमां सेवा, एक ज सुखकारी…

ॐजय सद्गुरु स्वामी...


Audio

आरती ओ बापू आरती

 मन तेरा मंदिर आँखे दिया बाती

होठों की हैं थालियाँ बोल फूल पाती

रोम रोम जिव्हा तेरा नाम पुकारती

आरती ओ बापू आरती

ये हैं तारणहार की आरती


हे सद्गुरू दीनदयाला 

तुमसा न कोई दूजा

तेरी भक्ति करूँ मैं निशदिन 

और करूँ तुम्हारी पूजा

ये गहरे दिन और रातें

तेरी लिखी न जाए बातें

कोई माने या न माने

हम भक्त तेरे दीवाने

तेरे पाँव सारी दुनिया पखारती

आरती ओ बापू आरती...


हे महाकाल महाशक्ति

हमें दे दो ऐसी भक्ति

हे जगत पिता परमेश्वर

तेरे चरणों में मिलती मुक्ति

तू अजर अमर अविनाशी

तू अनमिट पूरणमाशी 

सब करके दूर अँधेरे

हमें बक्शो नए सवेरे

तुमने भक्तों की बिगड़ी सँवर ली

आरती ओ बापू आरती...


गुण दाता सत्य प्रकाशा

हे अंतर्यामी देवा

मुझे इतना वर बस दे दो

नित करूँ तुम्हारी सेवा

तेरी कीमत तू ही जाने

तू भला बुरा पहचाने

जो तेरी महिमा गाए

वो मन की मुरादे पाए

हर आँख तेरी ओर निहारती

आरती ओ बापू आरती...


मन तेरा मंदिर आँखे दिया बाती

होठों की हैं थालियाँ बोल फूल पाती

रोम रोम जिव्हा तेरा नाम पुकारती

आरती ओ बापू आरती

ये हैं तारणहार की आरती

तेरे पाँव सारी दुनिया पखारती

तुमने भक्तों की बिगड़ी सँवर ली

हर आँख तेरी ओर निहारती

Audio

आरती सद्गुरु प्यारे की

 आरती सद्गुरु प्यारे की

भक्तजन तारणहारे की


छटा सद्गृरु की मनमोहे

नयन अमृतवर्षी सोहे

ललित अति भाल मस्त हैं चाल

कष्ट सब तारणहारे की

आरती सद्गुरु प्यारे की...


शीश पर गुरुआज्ञा राखी

पढ़ी चरणों में बैठ साखी

मिली गुरूकृपा मिटी सब व्यथा

हमारे सदगुरू प्यारे की

आरती सद्गुरु प्यारे की...


किया तप ब्रह्मज्ञान पाया

दूर भागी सारी माया

बाँटते ज्ञान मिटे अज्ञान

तत्व दर्शावनवारे की

आरती सद्गुरु प्यारे की...


दृष्टि से शक्तिपात करते

सभी चिंता व दुःख हरते

देते शांति धवल कांति

मंगीबा राजदुलारे की

आरती सद्गुरु प्यारे की...


मोहमाया में जो सोते

खा रहे भव में जो गोते

करें भवपार दे सबको तार

कृपा बरसावनवारे की

आरती सद्गुरु प्यारे की...


सब जगह फिरते रहते आप

मिटाते सबका दुःख संताप

प्रगट भगवान निराली शान

के सबकी आँखों के तारे की

आरती सद्गुरु प्यारे की...

Audio 1

Audio 2


देखी बहुत निराली हैं महिमा

 देखी बहुत निराली हैं महिमा 

देखी अजब निराली हैं महिमा 

संतो के सत्संग की,साँई के सत्संग की


सत्संग अंदर हीरे मोती 

मिलते लेकिन धीरे धीरे

हैं जिसने खोज निकाला

हैं महिमा सत्संग की

संतो के सत्संग की,साँई के सत्संग की..


सत्संग ही सब कष्टों को तारे

डूब रहे को सत्संग तारे

दिनोंदिन खुशहाली

हैं महिमा सत्संग की

संतो के सत्संग की,साँई के सत्संग की..


सत्संग सच्चा तीरथ भाई

करते जिसकी नेक कमाई

करम हीन रहे खाली

हैं महिमा सत्संग की

संतो के सत्संग की,साँई के सत्संग की..


देखी बहुत निराली हैं महिमा 

देखी अजब निराली हैं महिमा 

संतो के सत्संग की,साँई के सत्संग की


Audio

मेरी बाह पकड़ लो प्रभु

 मेरी बाह पकड़ लो एक बार

एक बार प्रभु एक बार


यह जग अति गहरा सागर हैं

सिर धरि पाप की गागर हैं

कुछ हल्का कर दो भार

प्रभु एक बार...


एक जाल बिछा मोहमाया का

एक धोखा कंचन काया का

मेरा कर दो मुक्त विचार

प्रभु एक बार...


हैं कठिन डगर मुश्किल चलना

बलहीन को बल दे दो अपना

कर जाऊँ भवभय पार

प्रभु एक बार...


मैं हार गया अपने बल से 

निर्दोष बचाओ जग छल से

सौ बार नहीं एक बार

प्रभु एक बार...


Audio

गुरूवर अब मैं शरण तिहारी

 गुरूवर अब मैं शरण तिहारी

गुरूवर हे गुरूवर,अब मैं शरण तिहारी


अनजाना पथ दूर नगरिया

रात कठिन अँधियारी

काम क्रोध मद लोभ मोह की

पग पग पर बँटमारी

गुरूवर अब मैं शरण तिहारी...


चौरासी का आना जाना

सिर पर गठरी भारी

जनम मरण की दुस्तर नदिया

जर जर नाँव हमारी

गुरूवर अब मैं शरण तिहारी...


स्वप्न लोक यह माया नगरी

भ्रमित सकल नर नारी

झूठे सारे रिश्ते नाते

झूठी दुनियादारी

गुरूवर अब मैं शरण तिहारी...


"मैं- मेरी" की भूल भुलैय्या

अहंकार अति भारी

करण- करावनधार तुमही हो

चरणन की बलिहारी

गुरूवर अब मैं शरण तिहारी...


Audio

मन तोहे कौन जतन

 मन तोहे कौन जतन हरि भाए

कौन जतन हरि भाए...


जप तप ध्यान साधु की संगत

महिमा नाम सुहाए

चिंतन मनन भजन रत होकर

नित नित हरि गुण गाए

मन तोहे...


किस विधि भोग विषय रस छूटे

भगवद रस एक कहाए

मोह ममता से निरत हुआ तू

समता सरित बहाए

मन तोहे...


काम क्रोध लोभ मद लोभ तजे रे

घट में नाम रिझाए

ना काहू से राग रहे रे

ना कोऊ बैरी पाए

मन तोहे...


कल कल करते काल गंवाया

पल पल आज गंवाया

अंत मता सो गता बाँवरे

उठ निर्दोष जगाए

मन तोहे...


Audio

गुरूदेव मेरे तुमको

 गुरूदेव मेरे तुमको

भक्तों ने पुकारा हैं

आओ अब आ जाओ

एक तेरा सहारा हैं

गुरूदेव मेरे तुमको

भक्तों ने पुकारा हैं...


हैं चारों तरफ छाया 

मेरे घोर अंधेरा हैं

अब जाएँ कहाँ बोलो

तूफानों ने घेरा हैं

हे नाथ अनाथों को

तेरा ही सहारा हैं

गुरूदेव मेरे तुमको...


मजधार पड़ी नैय्या 

डगमग डोला खाए

मिल जाओ हमें आकर

हम भव से तर जाएँ

बिन तेरे नहीं जग में

एक पल भी गुजारा हैं

गुरूदेव मेरे तुमको...


तेरे इन चरणों की

धूली ही जो मिल जाएँ

भटके हुए राही को

निज मंजिल मिल जाएँ

किस्मत भी चमक जाएँ

जो चमके सितारा हैं

गुरूदेव मेरे तुमको...


सेवा गुरू चरणन की

मुक्ति भव तरणन की

महिमा गुरू वर्णन की

ज्ञाता शुभ कर्मण की

गुरू ज्ञान संजीवन की

बहती एक धारा हैं

गुरूदेव मेरे तुमको...


भ्रम सम गुरूशक्ति को

कोई पार नहीं पाए

दो दर्शन अब गुरूवर

चरणों में लिपट जाए

ये भक्त सदा करता

गुणगान तुम्हारा हैं

गुरूदेव मेरे तुमको...


Audio

आ दरस दिखा दे गुरुदेव

 आ दरस दिखा दे गुरूदेव

तुझे तेरे लाल बुलाते हैं

तुझे रो रो पुकारें मेरे नैन

तुझे तेरे लाल बुलाते हैं

आ दरस दिखा दे गुरूदेव...


आँखों के आँसूं सूख चुके हैं

अब तो दरश दिखा दे

कबसे खड़े हैं दर पर तेरे

मन की तू प्यास बुझा दे

तेरी लीला निराली गुरुदेव

तुझे तेरे लाल बुलाते हैं...


बीच भँवर में नैय्या पड़ी हैं

आकर तू पार लगा दे

तेरे सिवा मेरा कोई नहीं हैं

आकर गले से लगा ले

क्यों देर लगाते गुरुदेव

तुझे तेरे लाल बुलाते हैं...


डूब रहा हैं सुख का ये सूरज

गम की बदरिया हैं छाई

उजड़ गई बगिया जीवन की

मन की कली मुरझाई

करें विनती ये बालक आज

तुझे तेरे लाल बुलाते हैं...


वैसे तो तुम हो मन में हमारे

ऑंखें नहीं मानती हैं

एक पल गुरू से ये अब बिछुड़ कर

रहना नहीं चाहती हैं

बरबस बरसाए नीर

तुझे तेरे लाल बुलाते हैं...


Audio

तुमको निहारने को दिल चाहता हैं

 तुमको निहारने को 

दिल ये चाहता हैं

बापू तुमको निहारने को 

दिल ये चाहता हैं

मन में उतारने को 

दिल ये चाहता हैं।।धृ।।


तुम सामने हमारे 

तुम साथ में हमारे

तो भी पुकारने को

दिल ये चाहता हैं

तुमको निहारने को...


ये ज्योति बिंदु प्यारा

क्या रूप हैं तुम्हारा

किरणों ने रोका

रूप हैं सँवारा 

किस्मत सँवारने को

दिल ये चाहता हैं

मन में उतारने को 

तुम सामने हमारे 

तुम साथ में हमारे

तो भी पुकारने को

दिल ये चाहता हैं

तुमको निहारने को...


Audio

कर सेवा गुरू चरणन की

 कर सेवा गुरू चरणन की

युक्ति यही भव तरणन की


गुरू की महिमा हैं भारी

वेग करें भव जल पारी 

विपदा हरे यह तन मन की

कर सेवा गुरू चरणन की...


मन की दुविधा दूर करें

ज्ञान भक्ति भरपूर भरे

भेद करें शुभ कर मन की

कर सेवा गुरू चरणन की...


गुरू तो दयालू होते हैं

मन के मैल को धोते हैं

मोह हटावे विषयन की

कर सेवा गुरू चरणन की...


भेद भरम सब मिटा दिया

घट में दर्शन करा दिया

कैसी लीला दर्शन की

कर सेवा गुरू चरणन की...


कर सेवा गुरू चरणन की

युक्ति यही भव तरणन की


गुरू चरणों में झुक जाओ

भक्त कहे नित गुण गाओ

करूँ वंदना चरणन की 

कर सेवा गुरू चरणन की...


कर सेवा गुरू चरणन की

युक्ति यही भव तरणन की...


Audio

अब दे दो गीता ज्ञान

 अब दे दो गीता ज्ञान 

मिटे अज्ञान गुरूजी हमारे 

हम आए शरण तुम्हारे


बालकपन खेलन में खोया 

यौवन निद्रा में तू सोया

भय वृद्ध तो हो गए 

जर जट गात हमारे

हम आए शरण तुम्हारे

अब दे दो...


सुत मात पिता बांधव दारा

नश्वर सम्बंध हैं ये सारे

जाएँगे संग शुभाशुभ कर्म हमारे

हम आए शरण तुम्हारे

अब दे दो...


फँसकर मैं जग की माया में

दुःख पाता था इस काया में

निज ज्योति से ज्योति

जगाओ गुरूजी हमारे 

हम आए शरण तुम्हारे

अब दे दो...


सेवक पर स्वामी दया करो

भव भय संकट सब आप हरो

कर्मों के दोष न देखो आप हमारे

हम आए शरण तुम्हारे

अब दे दो...


गुरू चरणों में यह अर्जी हैं

आगे प्रभु आपकी मर्जी हैं

गुरूकृपा मिले तो जागे भाग्य हमारे

हम आए शरण तुम्हारे

अब दे दो...


Audio

इस योग्य हम कहाँ हैं

 इस योग्य हम कहाँ हैं

गुरूवर तुझे रिझाए

फिर भी मना रहे हैं

शायद तू मान जाए

इस योग्य हम कहाँ हैं...


जबसे जनम लिया हैं

विषयों ने हमको घेरा

छल और कपट ने डाला

इस भोले मन पे डेरा

सद्बुद्धि को अहं को

हरदम रखा दबाए

इस योग्य हम कहाँ हैं...


निश्चय ही हम पथित हैं

लोभी हैं स्वार्थी हैं

तेरा ध्यान जब लगाए 

माया पुकारती हैं

सुख भोगने की इच्छा

कभी तृप्त हो न पाए

इस योग्य हम कहाँ हैं ...


जग में जहाँ भी देखा

बस एक ही चलन हैं

इक दूसरे के सुख में

खुद को बड़ी जलन हैं

कर्मों का लेखा जोखा

कोई समझ न पाए

इस योग्य हम कहाँ हैं...


जब कुछ न कर सके तो

तेरी शरण में आए

अपराध मानते हैं

झेलेंगे सब सजाएँ

अब ज्ञान हमको दे दे

कुछ और हम न चाहे

इस योग्य हम कहाँ हैं...


Audio

मुझे ऐसा वर दे दे

 मुझे ऐसा वर दे दे

गुणगान करूँ तेरा

इस बालक के सिर पे गुरू

हाथ रहे तेरा

मुझे ऐसा वर दे दे...


सेवा नित तेरी करूँ

तेरे द्वार पे आऊँ मैं

चरणों की धूली को

निज शीश लगाऊँ मैं

चरणामृत पाकर के

नित कर्म करूँ मेरा

इस बालक के सिर पे गुरू

हाथ रहे तेरा

मुझे ऐसा वर दे दे...


भक्ति और शक्ति दो

अज्ञान को दूर करो

अरदास करूँ गुरूवर

अभिमान को चूर करो

नहीं द्वेष रहें मन में

रहे वास गुरू तेरा

इस बालक के सिर पे गुरू

हाथ रहे तेरा

मुझे ऐसा वर दे दे...


विश्वास हो ये मन में

तुम साथ ही हो मेरे

तेरे ध्यान में सोऊँ मैं

सपनों में रहो मेरे

चरणों से लिपट जाऊँ

तुम ख्याल करो मेरा

इस बालक के सिर पे गुरू

हाथ रहे तेरा

मुझे ऐसा वर दे दे...


मेरे यश कीर्ति को

गुरू मुझसे दूर रखो

इस मनमंदिर में तुम

भक्ति भरपूर भरो

तेरी ज्योत जगे मन में

नित ध्यान धरूँ तेरा

इस बालक के सिर पे गुरू

हाथ रहे तेरा

मुझे ऐसा वर दे दे...


Audio

गुरुज्ञान की बजेगी शहनाई रे

 गुरुज्ञान की बजेगी शहनाई रे

मेरा मौन न जाने कोई


विश्वगुरू हो भारत प्यारा

ऐसा हैं संकल्प हमारा 

समय ने ली अंगड़ाई रे

मेरा मौन न जाने कोई...


सूक्ष्म जगत में मच गई हलचल

निकट आ रही शुभ घड़ी हर पल

परिवर्तन बेला आई रे

मेरा मौन न जाने कोई...


प्रीत करे जो मुझसे प्यारे

सत्संग उनको सहज ही तारे

निगुरे देखत रह जाए रे

मेरा मौन न जाने कोई...


बाहर से खामोश रहे हम

भीतर भीतर देख

मेरा मौन न जाने कोई...


जग में शांति फिर आएगी

फिरसे खुशहाली छाएगी

गुरुज्ञान की बजेगी शहनाई रे

मेरा मौन न जाने कोई...


Audio

मुझे सद्गुरुजी वो दिल दो

 मुझे सद्गुरु जी वो दिल दो

कि जिसमें प्यार तेरा हो

जुबाँ वो दो जो करती हर समय

गुणगान तेरा हो

मुझे सद्गुरु जी वो दिल दो...


मुझे वो दीजिए आँखे जिन्हें हो

प्यास दर्शन की

कि कण-कण में सतगुरू

केवल दीदार तेरा हो

मुझे सद्गुरु जी वो दिल दो...


मुझे देना सदा संगत तो देना

अपने प्यारों की

कि जिनको हर समय विश्वास और

ऐतबार तेरा हो

मुझे सद्गुरु जी वो दिल दो...


मेरा साथी जमाने में बनाना

उनको ऐ सतगुरू

दया हो जिसके दिल में

और सेवादार तेरा हो

मुझे सद्गुरु जी वो दिल दो...


इन आँखों में लगाता ही फिरूँ मैं

चरणरज तेरी

भगत निष्काम जो करता 

सदा प्रचार तेरा हो

मुझे सद्गुरु जी वो दिल दो...


ये सेवक काँट ही लेगा खुशीसे

जिंदगी के दिन

मेरे सिर पर दया का हाथ

जब दातार तेरा हो

मुझे सद्गुरु जी वो दिल दो...


Audio

दरबार में सच्चे सतगुरू के

 दरबार में सच्चे सद्गुरू के

दुःख दर्द मिटाए जाते हैं

दुनिया के सताए लोग यहाँ

सीने से लगाए जाते हैं

दरबार में सच्चे सद्गुरू के...


ये महफ़िल हैं मस्तानों की

हर शख्स यहाँ पर मतवाला

भर-भर के जाम इबादत के

यहाँ सबको पिलाए जाते हैं

दरबार में सच्चे सद्गुरू के...


ऐ जगवालों क्यों डरते हो

इस दर पर शीश झुकाने से

ऐ नदानों ये वह दर हैं 

सर भेंट चढ़ाए जाते है

दरबार में सच्चे सद्गुरू के...


इल्जाम लगाने वालों ने

इल्जाम लगाए लाख मगर

तेरी सौगात समझ कर के

हम सिर पे उठाए जाते हैं

दरबार में सच्चे सद्गुरू के...


जिन प्यारों पर ऐ जगवालों

हो खास इनायत सतगुरू की

उनको ही संदेशा आता हैं

और वोही बुलाए जाते हैं

दरबार में सच्चे सद्गुरू के...


Audio

हो गई रहमत तेरी

 हो गई रहमत तेरी

सद्गुरु रहमत छा गई

देखते ही देखते 

आँखों में मस्ती आ गई


गम मेरे सब मिट गए और

मिट गए रंजोअलम

जबसे देखे हैं तेरे 

दीदार ऐ मेरे सनम

हो गई रहमत तेरी...


आँख तेरी ने पिलाई

हैं मुझे ऐसी शराब

बेखुदी से मस्त हो

उठ गए सारे हजाब

हो गई रहमत तेरी...


मस्त करती जा रही

शक्ल नूरानी तेरी

कुछ पता से दे रही

ऑंख मस्तानी तेरी

हो गई रहमत तेरी...


अब तो जिऊँगा मैं दुनिया

में तेरा ही नाम ले

आ जरा नैनों के सदके

मुझको सदगुरू थाम ले

हो गई रहमत तेरी....


Audio

सागर से भी गहरा

 सागर से भी गहरा बंदे 

गुरुदेव का प्यार हैं

देख लगाकर गोता एक बार

तेरा बेड़ा पार हैं

सागर से भी गहरा बंदे...


भवसागर में एक दिन तेरी

जीवन नैय्या डूबेगी

खेते खेते एक दिन तो

पतवार भी तेरी टूटेगी

जाएगा उस पार तू कैसे

चारों ओर अंधकार हैं

देख लगाकर गोता एक बार

तेरा बेड़ा पार हैं

सागर से भी गहरा बंदे...


सौंप दे नैय्या गुरुदेव को

वोही पार लगा देंगे

पैर पकड़ ले जाकर के तू

सोए भाग्य जगा देंगे

पापी से भी पापी को भी

करते ना इनकार हैं

देख लगाकर गोता एक बार

तेरा बेड़ा पार हैं

सागर से भी गहरा बंदे...


संत समागम हरि कथा भी

गुरू की कृपा से पाओगे

खुद आएँगे गोविंदा गर

गुरू का आशिष पाओगे

बंदे बिन गुरूकृपा के तेरी

जिंदगी बेकार हैं

देख लगाकर गोता एक बार

तेरा बेड़ा पार हैं

सागर से भी गहरा बंदे...


Audio

आत्मशक्ति से ओतप्रोत

 आत्मशक्ति से ओतप्रोत 

विद्या और ज्ञान से भर दो

गुरूवर ऐसा वर दो


रहे मनोबल अचल मेरू सा

तनिक नहीं घबराऊँ 

प्रबल आँधियाँ रोक सके ना

आगे बढ़ता जाऊँ

उड़ जाऊँ निर्बाध लक्ष्य तक 

गुरूवर ऐसे पर दो

गुरूवर ऐसा वर दो


हैं अज्ञान निशा अँधियारी

तुम दिनकर बन आओ

ज्ञान और भक्ति की शिक्षा

बालक को समझाओ

विनय भरा गुरू ज्ञान मुझे दो

मन ज्योतिर्मय कर दो

मन ज्योतिर्मय कर दो


सुमति सुजस सुख संपत्ति दाता

हे गुरूवर अपना लो

संत समागम चाहूँ मैं

मुझे अपने पास बिठा लो

जैसा भी तेरा ही हूँ

हाथ दया का धर दो

गुरूवर ऐसा वर दो


मैं अबोध शिशु हूँ गुरू तेरा

दोष ध्यान मत देना

सब भक्तों के साथ मुझे भी

शरण चरण की देना

हे गुरूवर सुख ज्ञान अभय और

मन भक्ति से भर दो

गुरूवर ऐसा वर दो


उड़ जाऊँ निर्बाध लक्ष्य तक 

गुरूवर ऐसे पर दो

गुरूवर ऐसा वर दो


विनय भरा गुरू ज्ञान मुझे दो

मन ज्योतिर्मय कर दो

गुरूवर ऐसा वर दो


जैसा भी तेरा ही हूँ

हाथ दया का धर दो

गुरूवर ऐसा वर दो


Audio

निगुरे नहीं रहना

 सुन लो चतुर सुजान

निगुरे नहीं रहना


निगुरे का नही कहीं ठिकाना

चौरासी में आना जाना 

पड़े नरक की खान

निगुरे नहीं रहना

सुन लो...


गुरू बिन माला क्या सटकावे

मनवा चहुँ दिश फिरता जावे

यम का बने महमान 

निगुरे नहीं रहना

सुन लो...


हीरा जैसी सुंदर काया

हरि भजन बिन जनम गंवाया

कैसे हो कल्याण

निगुरे नहीं रहना

सुन लो...


निगुरा होता इह का अंधा

खूब करें संसार का धंधा

क्यों करता अभिमान

निगुरे नहीं रहना

सुन लो...


Audio

जय सदगुरू स्वामी

 जय सद्गुरु स्वामी

ॐ जय सद्गुरु स्वामी

अधमोद्धारण प्रभुजी 

नमिये शीश नामी

ॐ जय सद्गुरु स्वामी


अलख निरंजन आप

छो तमे अविनाशी

शुद्ध स्वयं प्रकाशी

सहुना सुखराशि 

ॐ जय सद्गुरु स्वामी


सद्चिदानंद स्वरूप

शब्दातीत स्वामी

शब्दसुधारस सिंधु

अविचल पदधामी

ॐ जय सद्गुरु स्वामी


राम रुपे रमी रहया छो

सर्व महि व्यापी

अनुपम रूप तमारू

कोण शके पामी

ॐ जय सद्गुरु स्वामी


भवसागर मां बूडता

जीव तारी लीधा

तत्वमसि समझावी

आपस्वरूप कीधा

ॐ जय सद्गुरु स्वामी


शंकर शुद्ध स्वरूप

हे करूणाकारी

सकण जगत मां सेवा

एक ज सुखकारी

ॐ जय सद्गुरु स्वामी


Audio

ॐ जय जगदीश हरे

 ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट साध जनों के संकट क्षण में दूर करे॥

ॐ जय जगदीश हरे...


जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥


मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ ॐ जय...॥


तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ 

ॐ जय...॥


तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ 

ॐ जय...॥


तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूँ दयामय! तुमको मैं कुमति॥ 

ॐ जय...॥


दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

 ॐ जय...॥


विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ 

ॐ जय...॥


तन-मन-धन सब हैं तेरा,स्वामी सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥

ॐ जय...॥


जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ 

ॐ जय...॥


Audio 1

Audio 2

Audio 3

जय सद्गुरु देवन देव वरं-गुरू वंदना

जय सद्गुरु देवन देव वरं, निज भक्तन रक्षण देह धरं ।

पर दुःख हरं सुख शांति करं, निरुपाधि निरामय दिव्य परं ।।1।।


जय काल अबाधित शांतिमयं, जन पोषक शोषक ताप त्रयं ।

भय भंजन देत परम अभयं, मन रंजन भाविक भाव प्रियं ॥2॥


ममातादिक दोष नशावत है, शम आदिक भाव सिखावत हैं ।

जग जीवन पाप निवारत है, भवसागर पार उतारत हैं ||3||


कहूँ धर्म बतावत ध्यान कहीं, कहूँ भक्ति सिखावत ज्ञान कहीं ।

उपदेशत नेम अरु प्रेम तुम्हीं, करते प्रभु योग अरु क्षेम तुम्हीं ॥4॥


मन इन्द्रिय जाही न जान सके, नहीं बुद्धि जिसे पहचान सके ।

नहीं शब्द जहाँ पर जाय सके, बिनु सद्गुरु कौन लखाय सके ॥5॥


नहीं ध्यान न ध्यातृ न ध्येय जहाँ, नहीं ज्ञातृ न ज्ञान न ज्ञेय जहाँ ।

नहीं देश न काल न वस्तु तहाँ, बिनु सद्गुरु को पहुँचाय वहाँ ॥6॥


नहीं रूप न लक्षण ही जिसका, नहीं नाम न धाम कहीं जिसका ।

नहीं सत्य असत्य कहाय सके, गुरुदेव ही ताही जनाय सके ॥7॥


गुरु कीन कृपा भव त्रास गयी, मिट भूख गयी छुट प्यास गयी ।

नहीं काम रहा नहीं कर्म रहा, नहीं मृत्यु रहा नहीं जन्म रहा ॥8॥


भग राग गया हट द्वेष गया, अघ चूर्ण भया अणु पूर्ण भया ।

नहीं द्वैत रहा सम एक भया, भ्रम भेद मिटा मम तोर गया ॥9॥


नहीं मैं नहीं तू नहीं अन्य रहा, गुरु शाश्वत आप अनन्य रहा ।

गुरु सेवत ते नर धन्य यहाँ, तिनको नहीं दुःख यहाँ न वहाँ ॥10॥


Audio

प्रभु नाम अति मीठा

 प्रभु नाम अति मीठा हैं

कोई गा के देख ले

आ जाते भगवान 

कोई बुला के देख ले 


मन भगवान का मंदिर हैं

यहाँ मैल न आने देना

हीरा जन्म अमोल मिला 

इसे व्यर्थ गंवा न देना

कोई जोहरी मिले तो

मोल लगा कि देख ले

आ जाते भगवान 

कोई बुला के देख ले

प्रभु नाम अति मीठा....


जिस मन में अभिमान भरा

भगवान कहाँ से आए

जिस घर में हो अंधेरा 

भगवान कहाँ से आए

प्रभु नाम की ज्योति

कोई जगा के देख ले

आ जाते भगवान 

कोई बुला के देख ले

प्रभु नाम अति मीठा मीठा....


आधे नाम पे आ जाते 

हो कोई बुलाने वाला

बिक जाते भगवान

हो कोई मोल लगाने वाला

दीए प्रभु मिलते हैं

कोई चढ़ा के देख ले

आ जाते भगवान 

कोई बुला के देख ले

प्रभु नाम अति मीठा मीठा....


गज गणिका और गीध

अजामिल ने ऐसी करी कमाई

नीच कर्म करने पर

फिर भी तर गए कसाई

पत्थर से प्रभु प्रगट हुए

प्रगटा के देख ले

आ जाते भगवान 

कोई बुला के देख ले

प्रभु नाम अति मीठा मीठा....


Audio

आनंद सिंधु परमेश्वर को

 आनंद सिंधु परमेश्वर को 

मन भज ले बारं बार

जो अखिल विश्व का जीवन हैं 

प्रभु अनुपम सर्वाधार 


जिसके कारण नाना तन धर

यूँ भटक रहे हो इधर उधर

वह निधि तो हैं तेरे अंदर

तुम खोज फिरे संसार 

आनंद सिंधु परमेश्वर को ....


इस तन का कौन ठिकाना हैं

कुछ दिन में ही तो जाना हैं

क्यों माया में दीवाना हैं

कर ले अपना उद्धार

आनंद सिंधु परमेश्वर को ....


धन हैं तो कुछ नेकी कर ले

बल विद्या से भक्ति भर ले

श्री सद्गृरु का आश्रय भर ले

हो जाए भव पार

आनंद सिंधु परमेश्वर को ....


जो खुद को यहाँ फँसएगा

वो उतना ही दुःख पाएगा

ये कुछ भी काम न आएगा

जाएगा हाथ पसार

आनंद सिंधु परमेश्वर को ....


जब जाग गया तो सोना क्या

यदि समझ गया तो रोना क्या

पाकर के अब फिर खोना क्या

यह पथिक मुक्ति का द्वार

आनंद सिंधु परमेश्वर को ....


Audio

सदगुरू के चरणों में हमने

 सदगुरू के चरणों में हमने

जिस दिन से शीश झुकाया हैं

उस दिन से मेरा जन्म हुआ

और सफल हुई ये काया हैं


जग की मुझको परवाह नहीं

माया की भी कोई चाह नहीं

धनवान तरसते जिस धन को

उस धन को हमने पाया हैं

सदगुरू के चरणों में हमने...


हम मुक्त देश में रहते हैं

जहाँ प्रेम की गंगा बहती हैं

कोई मर के स्वर्ग जो पाता है

हम जीते जी स्वर्ग में रहते हैं

सदगुरू के चरणों में हमने...


हम चाल अनोखी चलते हैं

निराली मस्ती में रहते हैं

गुरू कृपा में शक्ति इतनी

भव बंधन से छुड़ाया हैं

सदगुरू के चरणों में हमने...


Audio

यह समय सदा न रहेगा

 यह समय सदा न रहेगा 

ये समय सदा न रहेगा 

परिवर्तनशील जगत में 

कबतक तू किसे चाहेगा

ये समय सदा न रहेगा ...


जो पुण्य कर सकें कर लें

सद्भावों से इह भर लें

सद्गुण का आश्रय धर लें

भव सागर से अब तर लें

ये कर न सका तो जीवन

माया से विवश बहेगा

ये समय सदा न रहेगा ...


यदि धन हैं तो दानी बन

विद्या हैं तो ज्ञानी बन

परमेश्वर का ध्यानी बन

अति सरल निरअभिमानी बन

चिंता न करे तू इसकी

कोई क्या मुझे कहेगा

ये समय सदा न रहेगा ...


अब सावधान हो जाना

अपना अज्ञान मिटाना

जो बिगड़ी उसे बनाना

अध्यात्म ज्ञान में आना

देहाभिमान वश प्राणी कर

जग में अति दुःख सहेगा

ये समय सदा न रहेगा ...


यह अवसर व्यर्थ न खोना

अपराधी कहीं न होना

मत मोहनिशा में सोना

ममतावश कहीं न रोना

वही पथिक अभय होगा जो

नित सदगुरू ज्ञान कहेगा

ये समय सदा न रहेगा ...


Audio

हम गुरू संदेश सुनाते हैं

 हम गुरू संदेश सुनाते हैं

इसको सब कोई क्या जाने

यह परम लाभ की बातें हैं

इसको सब कोई क्या जाने


ऐसा जग में संयोग नहीं

हो जिसका कभी वियोग नहीं

ऐसा कोई सुख भोग नहीं

जिसके पीछे दुःख रोग नहीं

भोगी बन सब पछताते हैं

इसको सब कोई क्या जाने

हम गुरू संदेश सुनाते हैं...


हैं सफल उसीका नर जीवन

जो रहता जग में त्यागी बन

जिसने जीता हैं अपना मन 

दैवी संपत्ति हैं जिसका धन

वे महापुरुष कहलाते हैं

इसको सब कोई क्या जाने

हम गुरू संदेश सुनाते हैं...


धन पाकर जो दानी न बने

जो सरल निरअभिमानी न बने

जो ईश्वर का ध्यानी न बने

जो आत्म तत्वज्ञानी न बने

वह जीवन व्यर्थ बिताते हैं

इसको सब कोई क्या जाने

हम गुरू संदेश सुनाते हैं...


जो व्यक्ति वस्तू का दास नहीं

दोषों का जिसमें वास नहीं

जिसमें दुर्वेश विलास नहीं

दुःख आते उसके पास नहीं

वह पथिक महतपद पाते हैं

इसको सब कोई क्या जाने

                हम गुरू संदेश सुनाते हैं...

Audio

सदा संत संगति में जाते रहोगे

 सदा संत संगति में जाते रहोगे

तो अज्ञान अपना मिटाते रहोगे

मिलेगी नहीं शांति तुमको कहीं भी

जो परमात्मा को भुलाते रहोगे


तुम्हें भी सभी ओर से सुख मिलेगा

जो दुखियों को सुख पहुँचाते रहोगे

तुम्हारी बनी और बनती रहेगी

जो बिगड़ी किसीकी बनाते रहोगे

सदा संत संगति में जाते रहोगे ...


सदा देने योग्य को देते रहे तुम

तो तुम भी वही यहाँ पाते रहोगे

न दोगे किसीको जो शुभ सुखद सुंदर 

कभी बैठे माखी उड़ाते रहोगे

सदा संत संगति में जाते रहोगे...


बनेंगे नहीं पाप तुमसे कही भी

जो पुण्यों की पूँजी बढ़ाते रहोगे

तभी तो निरंतर भजन हो सकेगा

जब द्वंद्वों से मन को बचाते रहोगे

सदा संत संगति में जाते रहोगे...


जो कुछ भी मिला हैं रहेगा न सब दिन

कहाँ तक यहाँ मन फँसाते रहोगे

पथिक अपने में अपने प्रियतम को पाकर

महोत्सव निरंतर मनाते रहोगे

सदा संत संगति में जाते रहोगे...

Audio


सब धनवान गरीब हैं

 सब धनवान गरीब हैं 

पहुँच मौत के पास

वो नर ही धनवान हैं

जो हैं हरि के दास


लंकेश्वर क्या ले गए 

क्या कपीस गए छोड़

सदा विराजे साथ में 

ऐसे धन को जोड़

रे मनवा ऐसे धन को जोड़


माया को सब जग भजे 

हरि को भजे न कोय

मनवा जो हरि को भजे 

तो माया चेरी होय

रे मनवा माया चेरी होय


बूँद बूँद में दया हरि की 

बरसे अंबरसे

क्यों तू जाकर छुप गया हैं 

भीजन के डर से

रे मनवा भीजन के डर से

क्यों तू जाकर छुप गया हैं 

भीजन के डर से

रे  पगले भीजन के डर से


वृथा डोल रहा बन बन में 

पूछत दर दर से

मन मंदिर में राम बसे हैं 

क्यों न चरण परसे

रे मनवा क्यों न चरण परसे


तरो तेरे पास हैं

अपने माही टटोल 

राई घटे ना तिल बढ़े

हरि बोलो हरि बोल

रे मनवा हरि बोलो हरि बोल


राम नाम की लूट हैं

लूट सके तो लूट

अंत समय पछताएगा 

प्राण जाएँगे छूट

रे मनवा प्राण जाएँगे छूट


राम नाम की लूट हैं

लूट सके तो लूट

रे मनवा लूट सके तो लूट

Audio



आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले

 आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिए।।धृ।।


चाँद तारे गगन में दिखे ना दिखे

चाँद तारे फलक में दिखे ना दिखे

मुझको तेरा नजारा सदा चाहिए

आसरा इस जहाँ का...


यहाँ ख़ुशियाँ हैं कम और ज्यादा हैं गम

जहाँ देखो वहीं पे भरम ही भरम

मेरी महफ़िल में शम्मा जले ना जले

मेरे दिल में उजाला तेरा चाहिए

आसरा इस जहाँ का...


कभी वैराग्य हैं कभी अनुराग हैं

यहाँ बदलते हैं माली,यही बाग हैं

मेरी चाहत की दुनिया बसे ना बसे

मेरे दिल में बसेरा तेरा चाहिए

आसरा इस जहाँ का...


मेरी धीमी हैं चाल और पथ हैं विशाल

हर कदम पर मुसीबत अब तू ही संभाल

पैर मेरे थके हैं चले ना चले

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिए

हो मेरे दिल में इशारा तेरा चाहिए

आसरा इस जहाँ का...

Audio

तुम हमारे थे प्रभुजी

तुम हमारे थे प्रभुजी, तुम हमारे हो

तुम हमारे ही रहोगे, ओ मेरे प्रियतम॥धृ।।


हम तुम्हारे थे प्रभुजी, हम तुम्हारे हैं

हम तुम्हारे ही रहेंगे,ओ मेरे प्रियतम॥


तुम्हें छोड़ सुन नंद दुलारे,कोई न मीत हमारो

किसके द्वारे जाएँ पुकारूँ,और न कोई सहारो 

अब तो आके बाँह पकड़ लो ,ओ मेरे प्रियतम

तुम हमारे थे प्रभुजी...


तेरे कारण सब जग छोड़ा,तुझ संग नाता जोड़ा… प्यारे 

एक बार प्रभु हँस कर कह दो,तू मेरा मैं तेरा … प्यारे 

साँची प्रीत की  रीत लगा लो ,ओ मेरे प्रियतम

तुम हमारे थे प्रभुजी…


दास की बिनती सुनलीजो,ओ ब्रिजराज दुलारे

आखरी आस यही जीवन की,पूरण करना प्यारे

एक बार हृदय से लगालो,ओ मेरे प्रियतम

तुम हमारे थे प्रभुजी  ...

Audio


मंगल फैलाए तेरा नाम हरि

मंगल फैलाए तेरा नाम हरि

तेरे नाम में आनंद आ जाए

दुःख चिंता सब मिट जाए

तेरे नाम में मन जो लग जाए


निर्मलता हरि नाम से मिलती

जप से भाग्य की रेखा बदलती

उसका जीवन धन्य हैं होता

गुरुदीक्षा जिसे मिल जाए

हरि नाम में आनंद आ जाए


जो भी मुख से नाम हैं जपता

नाम जपने से पाप हैं मिटता

बिगड़ी बने उसकी जीवन में

हरि हरि जो जपता जाए 

तेरे नाम में आनंद आ जाए


तारे हरि का नाम उसे जो

गुरूमुख हो हरि नाम जपे जो

हरि हरि प्रेम से जपता जाए

उद्धार हैं उसका हो जाए

हरि नाम में आनंद आ जाए


उसको शांति मिल जाती हैं

उसकी भ्रांति मिट जाती हैं

सब दोषों से मुक्त रहे वो

श्वासों में नाम जो बस जाए

हरि नाम में आनंद आ जाए


हितकारी तेरा नाम हैं जग में

असली धन यहीं हैं जीवन में

पावनकारी नाम हरि का

मंगलकारी नाम हरि का

सब सुखों की खान यहीं हैं

ये साधन जो आ जाए

हरि नाम में आनंद आ जाए


प्रेम गुरू का हैं जिस मन में

वो ही सफल हैं इस जीवन में

गुरू शरण में आए हैं जो भी

गुरूकृपा हैं मिल जाए

हरि नाम में आनंद आ जाए


मंगल करें हरि नाम सभी का

मंगल करें हरि नाम


राम नाम की हैं महिमा भारी

खुद जपते हैं शिव त्रिपुरारी

राम नाम की महिमा बताने

हनुमान बन आ जाए

हरि नाम में आनंद आ जाए

Audio


पंछिडा ओ पंछिडा

पंछिडा ओ पंछिडा

पंछिडा तू उड़ के जाना जोधपुर रे

मेरे साँई बापू से मिलके कहना जल्दी आओ रे

मेरे प्यारे बापू से मिलके कहना जल्दी आओ रे

पंछिडा ओ पंछिडा...


मेरे गाँव के साधक भाई जल्दी आओ रे

मेरे प्यारे बापू के लिए सुंदर हार लाओ रे

अच्छा लाओ सुंदर लाओ जल्दी आओ रे

मेरे प्यारे बापू से मिलके कहना जल्दी आओ रे

पंछिडा ओ पंछिडा...


मेरे गाँव के प्यारे भाई जल्दी आओ रे

ओ रायपुर के साधक भाई जल्दी आओ रे

मेरे प्यारे बापू के लिए सुंदर तिलक लाओ रे

अच्छा लाओ सुंदर लाओ जल्दी आओ रे

मेरे प्यारे बापू से मिलके कहना जल्दी आओ रे

पंछिडा ओ पंछिडा...


मेरे गाँव के प्यारे भाई जल्दी आओ रे

मेरे प्यारे बापू के लिए श्वेत वस्त्र लाओ रे

अच्छा लाओ सुंदर लाओ जल्दी आओ रे

मेरे प्यारे बापू से मिलके कहना जल्दी आओ रे

पंछिडा ओ पंछिडा...

Audio



ऐसा कोई संत मिले

 मेरा तार प्रभु से जोड़े 

ऐसा कोई संत मिले।।धृ।।


संत दरश के बडे महातम

दुर्लभ जग में संत समागम

मन का रास्ता मोड़े 

कि ऐसा कोई संत मिले

मेरा तार प्रभु से जोड़े ...


भटकत भटकत पथ नहीं मिलता

मन मेरा रोके नहीं रुकता

मेरे मन के भ्रम को तोड़े

कि ऐसा कोई संत मिले

मेरा तार प्रभु से जोड़े ...

Audio

जय तुलसी माता

जय जय जय तुलसी माता

जय तुलसी माता तुम्हारी 

जय तुलसी माता...


हे वृंदा श्यामा 

हरि चरणों की तुम प्यारी

जय तुलसी माता...


जिस घर के आँगन में तेरी हो बगिया

महके तेरी खुशबू से सारी दुनिया

तेरा सेवन जो भी नित नित करता हैं

बुद्धि शक्ति बढ़ती होता मन पावन

महिमा अपरंपार तेरी महिमा अपरंपार

विष्णुप्रिया वृंदा श्यामा विष्णुपूजिता माँ

जय तुलसी माता...


पूजन तेरा करते जो नित जल अर्पण

प्रभु भक्ति बढ़ती हैं होता निर्मल मन

तेरी माला करते हैं नित जो धारण

वो मुक्ति पाते करते सफल जीवन

देव करें हैं नमन तुम्हारी करते जयजयकार

विश्वपावनी माँ तुम्हारी जय करता संसार

जय तुलसी माता...


तिलक लगाएँ तुमको पुष्प चढ़ाते हम

धूप दीप दिखाएँ आरती करते हम

मंगलकारी परिक्रमा करते हैं हम

गुरुभक्ति बढ़ती रहें ये दो वरदान

तन मन स्वस्थ रहें जो तेरा सेवन नित्य करें

हरिप्रिया वृंदा श्यामा विष्णुपूजिता माँ

जय तुलसी माता...

Audio

तुलसी माँ

तुलसी माँ, तुलसी माँ...

जग में छाई तेरी महिमा


पूजन करूँ वंदन करूँ माँ

घर घर तुम्हें हम बसाएँगे

मिट्टी से रंग दिए हाथ अपने

तुलसी के पौधे लगाएँगे

संस्कृति की हो शान

भारत की पहचान

तुलसी माँ ...


हरिनाम की हरियाली छाई

उत्सव ये पावन आया

देवों ने ऋषियों ने किया

तुम्हारा गुणगान माँ

विष्णुप्रिया कहलाए 

जग में माधुर्य फैलाए

हो तुम प्राचीन इतिहास

औषध में तुम खास

तुलसी माँ....

Audio

तेरी महिमा हैं अपरंपार

ठंडी छाँव भरा तेरा दरबार

सारा ऑंगन हैं खुशबूदार

तेरी महिमा हैं अपरंपार

तुम्हें पूजे हैं सारा संसार

हे तुलसी मैय्या महिमा हैं अपरंपार

तुम्हें पूजे हैं सारा संसार


तेरा दरश जो करें,नित्य सेवन करें

पल में मिट जाते,रोग शोक पाप सारे

तीनों लोक में हैं जयजयकार

तेरी महिमा हैं अपरंपार...


शुक शौनकादि शेष योगी-भोगी दरवेश

तुम्हें पूजते सुरेश ब्रम्हा विष्णु महेश

वेद शास्त्र पुराण युग चार

तेरी महिमा हैं अपरंपार...


मैय्या तेरा जहाँ वास,यम आवै नहीं पास

सुख संपत्ति बढ़े,घर में भक्ति का वास

श्रीहरि दरश देते साकार

तेरी महिमा हैं अपरंपार...

Audio